
वैदिक दृष्टि से पूजा -पाठ की महत्ता काफी प्रभावकारी है। वैसे भी हिन्दू पंथ में पूजा-पाठ का विशेष महत्व है। यही एक पंत है जहां ईश्वर के साकार और निराकार दोनों स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन सच तो यह है कि हिन्दू पंथ में मूर्ति पूजा का विशेष महत्व है। हर पंथ और धर्म में अपने-अपने कुछ पूजा के नियम होते हैं। ठीक यही स्थिति सनातन धर्म में भी है जहां पूजा पद्धतियों के तीनों प्रकार यानि मंत्र, यंत्र, तंत्र तीनों स्वीकार किए गए हैं।
मंत्रों की बात करें तो ये पूरी तरह वैदिक तरीके से चलते हैं, हालांकि कुछ मंत्र तांत्रिक भी होते हैं लेकिन अधिकांशत: मंत्रों का परिचालन पूर्णत: वैदिक तरीके से ही होता है। वैसे तो मंत्रों के उच्चारण का तरीका और विधि पौराणिक काल में ही तय कर दी गई थी, लेकिन वर्तमान दौर में कुछ फेरबदल करके ही इन्हें अपनाया जाता है। क्योंकि पूरी क्रिया का पालन करना अत्याधिक आवश्कयक है, क्योंकि अगर हम ऐसा नहीं करते तो मंत्रों का फल हमें नहीं मिल पाता।
कुछ रिवाजों और विधि में तो हम अपने अनुसार फेरबदल कर चुके हैं लेकिन कुछ बातें वैदिक काल से ही चली आ रही हैं जिनका अनुसरण अत्यंत आवश्यक है। इसमें सबसे जरूरी है हर पूजन से पहले स्वस्ति वाचन का पाठ। यह चमत्कारी पाठ स्मस्त देवी-देवताओं को जागृत करता है।
स्वास्तिक मंत्र या स्वस्ति मंत्र, शुभ-लाभ और शांति के लिए किया जाता है। स्वस्ति, सु अस्ति से मिलकर बना है जिसका अर्थ है कल्याण हो। ऐसा माना जाता है इसका पाठ करने से हृदय और मन का मेल हो जाता है। इस मंत्र का उच्चारण करते समय कुशा से जल के छींटें डाले जाते हैं, जो घर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करता है। स्वस्ति पाठ करने की क्रिया को स्वस्तिवाचन का नाम दिया गया है।