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जानें नवरात्र के पहले दिन मां के किस रूप की होती है पूजा!

देहरादून;      आज नवरात्र शुरू हो चुके हैं और देश भर के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। सुबह से ही मंदिरों में भक्तों का तांता लगा हुआ है और चारों दिशाओं में मां के जयकारों की आवाज गूॅज रही है साथ ही साफाई पर आज विशेष ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जंहा सफाई होती है वहीं मां का वास होता है।
बात करें देहरादून की तो आज यहां के सभी मंदिरों में भक्तो की भारी भीड़ देखी जा सकती है और नेहरू काॅलोनी के स्नातन मंदिर में लोगों दूर-दूर से आकर मां वंदना में लगे हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि नवरात्र के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है, जानिए मां शैलपुत्री की कहानी विस्तार से-
नवरात्र के 9 दिनों और उन 9 दिनों में देवी दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा। इन 9 दिनों में देवी के अलग अलग रूपों की पूजा का अपना ही महत्व है।
जानिए मां शैलपुत्री और उनकी कहानी विस्तार से
मां शैलपुत्री सती के नाम से भी जानी जाती हैं। एक बार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ करवाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने सभी देवी-देवताओं को निमंत्रण भेज दिया, लेकिन भगवान शिव को नहीं। देवी सती भलीभांति जानती थी कि उनके पास निमंत्रण आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो उस यज्ञ में जाने के लिए बेचैन थीं, लेकिन भगवान शिव ने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि यज्ञ में जाने के लिए उनके पास कोई भी निमंत्रण नहीं आया है और इसलिए वहां जाना उचित नहीं है। सती नहीं मानीं और बार बार यज्ञ में जाने का आग्रह करती रहीं। सती के ना मानने की वजह से शिव को उनकी बात माननी पड़ी और शिव ने अनुमति दे दी।

सती जब अपने पिता प्रजापित दक्ष के यहां पहुंची तो देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं और सिर्फ उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। उनकी बाकी बहनें उनका उपहास उड़ा रहीं थीं और सति के पति भगवान शिव को भी तिरस्कृत कर रहीं थीं। स्वयं दक्ष ने भी अपमान करने का मौका ना छोड़ा। ऐसा व्यवहार देख सती दुखी हो गईं। अपना और अपने पति का अपमान उनसे सहन न हुआ…और फिर अगले ही पल उन्होंने वो कदम उठाया जिसकी कल्पना स्वयं दक्ष ने भी नहीं की होगी।
सती ने उसी यज्ञ की अग्नि में खुद को स्वाहा कर अपने प्राण त्याग दिए। भगवान शिव को जैसे ही इसके बारे में पता चला तो वो दुखी हो गए। दुख और गुस्से की ज्वाला में जलते हुए शिव ने उस यज्ञ को ध्वस्त कर दिया। इसी सती ने फिर हिमालय के यहां जन्म लिया और वहां जन्म लेने की वजह से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा।
माना जाता है कि मां शैलपुत्री का वास काशी नगरी वाराणसी में है। वहां शैलपुत्री का एक बेहद प्राचीन मंदिर है जिसके बारे में मान्यता है कि यहां मां शैलपुत्री के सिर्फ दर्शन करने से ही भक्तजनों की मुरादें पूरी हो जाती हैं। साथ ही नवरात्र के पहले दिन यानि प्रतिपदा को जो भी भक्त मां शैलपुत्री के दर्शन करता है उसके सारे वैवाहिक जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं। चूंकि मां शैलपुत्री का वाहन वृषभ है इसलिए इन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है। इनके बाएं हाथ में कमल और दाएं हाथ में त्रिशूल रहता है।
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