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हिमालयी राज्यों में दुर्लभ परिंदों का खतरे में अस्तित्व, मानवीय दखल और जलवायु परिवर्तन के कारण पलायन कर रहे परिंदे

देहरादून – हिमालयी राज्यों में बढ़ रहे मानवीय दखल और जलवायु परिवर्तन के कारण अब यहां के दुर्लभ परिंदों का अस्तित्व भी खतरे में है। उत्तराखंड, जम्मू और हिमाचल में वन अनुसंधान संस्थान देहरादून और राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के संयुक्त शोध में इस बात का खुलासा हुआ है। शोध में कहा गया है कि अस्तित्व बचाने के लिए यहां पाए जाने वाले अनेक परिंदे अब यहां से पलायन कर रहे हैं।

हिमालयी पक्षियों में किए गए शोध में प्रजाति वितरण मॉडलिंग का उपयोग किया गया। इसमें उत्तराखंड के चाकुर (चकोर),जम्मू के पिंड और हिमाचल प्रदेश के जाजुराना पक्षियों के अलावा 23 घटकों के प्रभावों को सम्मिलित किया गया। शोध में समय के अनुसार बदल रहे परिवेश में पक्षियों की स्थितियों का गहन अध्ययन किया गया है। शोध में विभिन्न संकटग्रस्त पक्षियों के संरक्षण, आवास को न प्रभावित करने वाली स्थितियों के वर्णन समेत संकटग्रस्त पक्षियों के संरक्षण की नीतियां बनाने का भी सुझाव दिया गया है।

संकट में है पक्षियों का जीवन
शोध में पाया गया है कि पर्यावरणीय स्थितियां अनुकूल न होने के कारण यह दुर्लभ प्रजातियां उच्च हिमालयी क्षेत्रों की ओर पलायन कर रही हैं। आने वाले समय में इन पक्षियों को आवासीय दृष्टि से और अधिक समस्याओं से जूझना पड़ेगा। वनों की आग, मानव आबादी का विस्तार, ताप परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं। भविष्य में इन पक्षियों को बढ़ते तापमान, प्रदूषण, पैराबैंगनी प्रभाव, हवाओं के दबाव, कार्बन उत्सर्जन आदि के कारण भी जीवन बचाने के लिए पलायन के लिए बाध्य होना पड़ सकता है। शोध के अनुसार वर्ष 2050 के बाद यह पक्षी 25 से 55 प्रतिशत तक हिमालय में पूर्वी क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होंगे।

प्रजनन और आवास उपयुक्त क्षेत्रों में आ रही कमी
शोध में यह निष्कर्ष भी निकला है कि इन पक्षियों के प्रजनन और आवास उपयुक्त क्षेत्रों में कमी आ रही है। वर्ष 2070 तक इसमें 14 किमी से अधिक की कमी आने की संभावना है। जबकि इस अवधि तक पक्षियों का स्थानांतरण क्षेत्र भी करीब 94 वर्ग किमी तक होगा।

देहरादून वन अनुसंधान संस्थान परियोजना प्रमुख डाॅ. हुकुम सिंह ने बताया कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने संकटग्रस्त सूची में दर्ज दुर्लभ हिमालयी पक्षियों के सरंक्षण के लिए यह शोध किया गया है। शोध से प्राप्त विभिन्न आंकड़े पक्षी विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े अध्ययनों में भी सहायक होंगे। दुर्लभ पक्षियों के संरक्षण के लिए गंभीरता से कार्य करने की जरूरत है।

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