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विश्व पृथ्वी दिवस पर भारत-नेपाल सीमापार गिद्धों के संरक्षण विषय पर हितधारकों की कार्यशाला का आयोजन…..

देहरादून- विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर दून विश्वविद्यालय एवं हिमालयन इंस्टिट्यूट फॉर सस्टेनेबल एनवायरनमेंट एंड रिसर्च सोसाइटी के संयुक्त तत्वाधान में “भारत-नेपाल सीमापार गिद्धों के संरक्षण विषय पर हितधारकों की कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राज्य जैव विविधता बोर्ड के अध्यक्ष एवं पीसीसीएफ, डॉ० धनञ्जय मोहन व कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ० सी० एस० नौटियाल, कुलपति दून विश्वविद्यालय द्वारा की गयी। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य, भारत-नेपाल सीमापार गिद्धों के संरक्षण हेतु दोनों देशों के बीच समन्वय स्थापित करना था। धनञ्जय मोहन ने कहा कि संकटप्राय गिद्धों का संरक्षण पर्यावरण के लिए अति आवश्यक है, लेकिन इसके लिए देश के भीतर एवं सीमापार से सभीहितधारकों को एक मंच पर आना होगा, यह कार्यशाला उस दिशा में महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगी। नेपाल से सरकार के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के उपसचिव हरिभद्र आचार्य और बर्ड कन्जर्वेसन नेपाल के कृष्णा प्रसाद भुसाल, ने कहा कि चूंकि गिद्धों सहित अन्य वन्यजीव किसी भी सीमा में बधें नहीं होते है, अतः प्रवास के दौरान उनका संरक्षण दोनों देशों के विभागों की जिम्मेदारी होती है”, लेकिन इसके लिए उचित आपसी समन्वय होना जरुरी है।

वहीं प्रोफेसर बी सी चैधरी ने कहा कि उत्तराखंड में संकटप्राय गिद्धों की संख्या में वृद्धि देखने को मिल रही है, किन्तु मृत मवेशियों का निस्तान्तरण हाई वोल्टेज पॉवर लाइन के आस-पास होने के कारण के कारण, बिजली के करंट से गिद्धों सहित अन्य शिकारी पक्षियों की अत्यधिक म्रत्यु हो रही है, और कहीं ऐसा न हो कि हम कुछ सालों में यह कहें कि हानिकारक औषधियों से कई अधिक बिजली का करंट ही गिद्धों के संख्या में भारी कमी के लिए जिम्म्मेदार है, अतः सभी हितधारकों को एक मंच पर आकर जरूरी कदम उठाने होंगे। पशुपालन विभाग के अपर निदेशक डॉ अशोक कुमार, तथा वरिष्ठ पशुचिकित्साधिकारी डॉ वशिष्ठ ने बताया कि “सर्वविदित है कि गिद्धों की मृत्यु के पीछे हानिकारक औषधियों का उपयोग तो था, लेकिन इसका अत्यधिक प्रयोग अप्रशिक्षित पेशेवर ही करते है, अतः सरकार द्वारा हानिकारक औषधियों के दुष्प्रयोग को रोकने के साथ-साथ, अप्रशिक्षित पेशेवर पर नियंत्रण लगाया जाना आवश्यक होगा। मृत मवेशी निस्तान्तरण समिति हरिद्वार एवं देहरादून के सदस्यों हाजी इकराम, राजेश कुमार एवं अन्य द्वारा अपनी विभिन्न समस्यों को उठाया गया जिसमें मृत मवेशी निस्तान्तरण हेतु उचित स्थानों का आवंटन न होना प्रमुख था, जिससे की वह बिजली के तारों के आस-पास मृत-मवेशियों को फेंकने के लिए मजबूर हैं। अतः जिला प्रशासन को चाहिए कि वह मृत मवेशियों के निस्तारण हेतु उचित स्थान का चयन कर भूमि उपलब्ध करायें जिससे पर्यावरण के साथ-साथ गिद्धों के संरक्षण एवं विभिन्न बिमारियों के खतरों से मानव समाज को भी हानि होने से बचाया जा सके। राष्ट्रीय सुशासन केंद्र, मसूरी के डॉ अनिल मिश्रा ने कहा कि गिद्धों के संरक्षण के साथ-साथ ही मृत मवेशियों के निस्तान्तरण का विषय भी बेहद संवेदनशील है, अतः इस सम्बन्ध में हर राज्य के जिला स्तर के उच्च अधिकारियों को प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा जिससे वह स्वच्छ भारत अभियान के तहत इस हेतु भी आवश्यक कदम लें। इस कार्यशाला में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, नेशनल ट्रस्ट फॉर नेचर कन्जर्वेसन नेपाल, नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस, मसूरी, उत्तराखंड पॉवर कारपोरेशन लिमिटेड, स्टेट ड्रग कंट्रोलर ऑफिस, जैव विविधता प्रबंध समितियों के सदस्य, जीआईजेड, हिमालयन इंस्टिट्यूट फॉर सस्टेनेबल एनवायरनमेंट एंड रिसर्च सोसाइटी, जैव विविधता बोर्ड, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, देहरादून के प्रतिनिधियों सहित स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज, दून विश्वविद्यालय के फैकल्टीज,शोधार्थी, छात्र-छात्राओं सहित 100 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रतिभाग लिया। आये हुये समस्त अथितियों ने उत्तराखंड में गिद्धों के संरक्षण हेतु कार्य करने के लिए दून विश्वविद्यालय, हिमालयन इंस्टिट्यूट फॉर सस्टेनेबल एनवायरनमेंट एंड रिसर्च सोसाइटी के शोधकर्ताओं की टीम की भूरी-भूरी प्रसंशा करते हुए कहा कि इनके द्वारा इस क्षेत्र में किया गया कार्य संरक्षण हेतु एक प्रेरणा तो है ही, साथ ही मानव समाज के लिए भी भविष्य में इसके दूरगामी परिणाम अवश्य ही देखने को मिलेंगे। कार्यशाला के समन्वयक खीमानन्द बलोदी ने कार्यशाला को सफल बनाने के लिए सभी अथितियों, विभागों सहित रुफोर्ड फाउंडेशन, मोहम्मद बिन जायद कंजरवेसन फण्ड, कंजरवेसन लीडरशिप प्रोग्राम और उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड का आभार व्यक्त किया।

 

 

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