Homeअध्यात्मसफला एकादशी व्रत :पापों का नाश करता है!

सफला एकादशी व्रत :पापों का नाश करता है!

भारत एक ऐसा देश है जहां हर रोज त्यौहार मनाए जा सकते हैं। साल का ऐसा कोई भी महीना नहीं है जिसमें त्यौहार ना मनाए जाते हों। इन्हीं त्यौहारों की कड़ी में हम आपको सफला एकादशी के बारे में बताने जा रहे है । एकादशी मतलब ग्यारह से है।

एक महीने में दो एकादशी और एक साल में दो सफला एकादशी मनाई जाती है। सफला एकादशी व्रत पूस मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन होता है। इस बार सफला एकादशी 13 दिसंबर को मनाई जाएगी। वैसे यह त्यौहार दिसंबर और जनवरी माह में ही आता है।

सफला एकादशी की महत्ता
इस एकादशी की महत्ता ब्रहमांड पुराण में भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताई थी। माना जाता है कि सफला एकादशी का व्रत रखने से आपके सारे पाप धुल जाएंगे और आपके जीवन में खुशियां आती हैं । एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत शुभ दिन है और यह हिंदू कैलेंडर में हर चंद्र पखवाड़े के ग्यारहवें दिन आता है।
इसको लेकर एक कहानी भी है – मिथकों के अनुसार एक राजा के चार बेटे थे। उसका एक बेटा लुंपक हमेशा अपने पिता से भगवान विष्णु के अधिकार को लेकर सवाल करता रहता था। उसके इस रवैये से परेशान होकर राजा ने अपने बेटे को महल से बेदखल कर दिया।
घर से निकालने के बावजूद लुंपक के रवैये में कोई सुधार नहीं आया। और उसने बाहर जाकर गरीब गांव वालों को लूटना शुरू कर दिया। और उसने अपना घर बरगद के पेड़ के नीचे बना लिया। फिर उसने जानवरों को मारना और उनका कच्चा मांस खाना शुरू कर दिया।
एक बार सफला एकादशी के दिन वह गंभीर रूप से बीमार हो गया। इस वजह से वह पूरे दिन भूखा रहा। और रात भर जागता रहा। और अनजाने में ही उसने सफला एकादशी का व्रत पूरा किया। सुबह उसे ये महसूस हुआ कि यह सब कुछ भगवान विष्णु की वजह से हुआ है।और उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। और वह वापस अपने पिता के पास गया उसने अपनी गलतियों को लेकर मांफी मांगी। और खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ रहने लगा।

सफला एकादशी में पूजन विधि
इस दिन भगवान नारायण की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन उपवासक को शीघ्र उठकर, स्नान आदि कार्यों से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने लेना चाहिए। संकल्प लेने के बाद धूप, दीप, फल आदि से भगवान कृष्ण और नारायण देव का पंचामृत से पूजन करना चाहिए। द्वादशी तिथि के दिन स्नान करने के बाद पंडितों को अन्न और धन की दक्षिणा देकर इस व्रत का समापन किया जाता है।

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