विजन 2020 न्यूज: बुंदेलखंड के झांसी में एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे में जानकर दंग रह जाएंगे आप। यहां एक मंदिर ऐसा है जहां देवी-देवताओं की नहीं बल्कि एक काली कुतिया की पूजा होती है। यह मंदिर रेवन और ककवारा गांवों के बीच लिंक रोड पर स्थित है। इस मंदिर में काली कुतिया की मूर्ति स्थापित की गई है और इस मंदिर को कुतिया महारानी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में लोग प्रतिदिन पूजा करते हैं। श्रद्धालु यहां सुख-समृद्धि और परिवार एवं फसलों की खुशहाली की मन्नतें मांगते हैं। यहां के लोगों की कुतिया महारानी के प्रति अपार श्रद्धा है। बताया जाता है कि एक बार ककवारा और रेवन दोनों गांवों में पंगत का कार्यक्रम था। कुतिया को भी दोनों जगह जाना था, लेकिन वह उस दिन कुछ बीमार थी। ककवारा का रमतूला जैसे ही बजा, वह ककवारा की ओर दौड़ने लगी। जब तक वह ककवारा पहुंची, वहां पंगत खत्म हो चुकी थी। इसी दौरान रेवन गांव का रमतूला बजने लगा। कुतिया ने सोचा कि यदि देर हो गई तो रेवन की पंगत भी नहीं मिलेगी और उसे भूखा ही रहना पड़ेगा। यह सोचकर वह रेवन की ओर दौड़ गई। जब तक वह रेवन पहुंची, वहां की भी पंगत खत्म हो गई। दोनों ओर से खाना न मिलने और बीमारी की वजह से वह हताश होकर वापस चल पड़ी और रेवन व ककवारा के बीच एक स्थान पर सड़क किनारे गिरकर बेहोश हो गई और कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई। सुबह जब गांव वालों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने कुतिया के शव को वहीं पर दफना दिया और उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करा दिया। तब से यह कुतिया महारानी मां के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।अनोखा है ये मंदिर, यहां होती है काली कुतिया की पूजा
विजन 2020 न्यूज: बुंदेलखंड के झांसी में एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे में जानकर दंग रह जाएंगे आप। यहां एक मंदिर ऐसा है जहां देवी-देवताओं की नहीं बल्कि एक काली कुतिया की पूजा होती है। यह मंदिर रेवन और ककवारा गांवों के बीच लिंक रोड पर स्थित है। इस मंदिर में काली कुतिया की मूर्ति स्थापित की गई है और इस मंदिर को कुतिया महारानी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में लोग प्रतिदिन पूजा करते हैं। श्रद्धालु यहां सुख-समृद्धि और परिवार एवं फसलों की खुशहाली की मन्नतें मांगते हैं। यहां के लोगों की कुतिया महारानी के प्रति अपार श्रद्धा है। बताया जाता है कि एक बार ककवारा और रेवन दोनों गांवों में पंगत का कार्यक्रम था। कुतिया को भी दोनों जगह जाना था, लेकिन वह उस दिन कुछ बीमार थी। ककवारा का रमतूला जैसे ही बजा, वह ककवारा की ओर दौड़ने लगी। जब तक वह ककवारा पहुंची, वहां पंगत खत्म हो चुकी थी। इसी दौरान रेवन गांव का रमतूला बजने लगा। कुतिया ने सोचा कि यदि देर हो गई तो रेवन की पंगत भी नहीं मिलेगी और उसे भूखा ही रहना पड़ेगा। यह सोचकर वह रेवन की ओर दौड़ गई। जब तक वह रेवन पहुंची, वहां की भी पंगत खत्म हो गई। दोनों ओर से खाना न मिलने और बीमारी की वजह से वह हताश होकर वापस चल पड़ी और रेवन व ककवारा के बीच एक स्थान पर सड़क किनारे गिरकर बेहोश हो गई और कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई। सुबह जब गांव वालों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने कुतिया के शव को वहीं पर दफना दिया और उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करा दिया। तब से यह कुतिया महारानी मां के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।RELATED ARTICLES
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