देहरादून- राज्य गठन के बाद से उत्तराखंड का इतिहास रहा है कि प्रदेश में जिस पार्टी की सरकार रही है, उसे लोकसभा चुनाव में हार देखनी पड़ी है। इस बार भाजपा इस मिथक को तोड़ पाती है या नहीं, इस पर नजरें टिकी होंगी। हालांकि लोकसभा महासंग्राम मोदी बनाम राहुल है, लेकिन प्रदेश में तो असल इम्तिहान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का ही होगा। अगले एक माह में भाजपा और कांग्रेस पूरी ताकत के साथ चुनावी समर में उतरेंगी। प्रदेश भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए पांचों सीटें जीतने का दबाव है। यह दबाव इसलिए भी अधिक है कि मोदी लहर ने वर्ष 2017 में प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया था। त्रिवेंद्र रावत को प्रदेश की कमान सौंपने के बाद से मोदी सरकार ने प्रदेश को खास तरजीह दी है। केदारनाथ पुनर्निर्माण से लेकर साढ़े बारह हजार करोड़ की चार धाम ऑल वेदर रोड और ऋषिकेश कर्णप्रयाग राष्ट्रीय रेल परियोजना उत्तराखंड को मिली है। लोकसभा चुनाव में केंद्र की नीतियों और उपलब्धियों के अलावा मतदाता त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज को चुनावी कसौटी पर परखेगा। त्रिवेंद्र की परीक्षा इतनी भर नहीं है, उन्हें ‘जिसकी सरकार, उसको पड़ी मार’ के मिथक को भी तोड़ना होगा।
राज्य गठन के बाद हुए तीन लोकसभा चुनावों के नतीजे प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ रहे हैं। 2004 में प्रदेश में एनडी सरकार थी, तो कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी। 2009 में खंडूरी सरकार थी, तो भाजपा को एक भी सीट नसीब नहीं हो पाई थी। इसी तरह, 2014 की बात करें, तो हरीश रावत सरकार के रहते हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पांचों सीटों पर हार का मुंह देखना पड़ा था।



