
सरकार के विरुद्ध हाईकोर्ट पहुंचा आयोग

देहरादून। उत्तराखंड के 2381200 मतदाता स्थानीय निकायों के मतदान की प्रतीक्षा में है। भारी संख्या में चुनाव देने की तैयारी कर रहे मतदाताओं को अब तक सरकार की ओर से हरी झंडी नहीं मिली है। सूत्रों की माने तो 2015 में 1536817 मतदाता थे। इन्हीं मतदाताओं को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए उत्तराखंड सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों में ठन गई है। राज्य निर्वाचन आयुक्त सुवर्धन ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया तथा कहा कि राज्य सरकार चुनाव के मामले में संजीदा नहीं है दूसरी ओर उच्च न्यायालय नैनीताल ने भी इस मामले पर सरकार से जवाब मांगा है।
स्थानीय निकायो के राज्य निर्वान आयुक्त आयुक्त सुवर्धन ने पत्रवार्ता करते हुए कहा कि सरकार समय पर चुनाव करने में सहयोग नहीं कर रही है। अगर ऐसा ही रवैया रहा तो चुनाव नहीं हो सकेंगे। कहा कि चुनाव 3 मई से पहले होने हैं। सरकार सहयोग नहीं कर रही है। चुनाव आयुक्त ने कहा कि सरकार के असहयोग के कारण हमें कोर्ट में जाना पड़ा। अब कोर्ट तय करेगा कि प्रदेश में निकाय चुनाव कब होंगे।
राज्य निर्वाचन आयुक्त सुवर्धन का कहना है कि वह दो महीने के भीतर चुनाव कराने को तैयार है लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस निर्देश नहीं मिला जिसके कारण आयोग को न्यायालय जाना पड़ा।
राज्य निर्वाचन आयोग ने याचिका दायर कर कहा है कि राज्य में संविधान के अनुच्छेद 243-य के तहत राज्य में तीन मई तक निकायों का बोर्ड गठन होना जरूरी है। आयोग के अधिवक्ता संजय भट्ट ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ के अहमदाबाद नगर निगम बनाम किशन सिंह तोमर के मामले में दिए फैसले को याचिका में आधार बनाया गया है। निकायों के सीमा विस्तार के मामले को लेकर सरकार पहले से ही उलझी हुई है। यह मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इसकी वजह से निकाय चुनाव पीछे खिसकने की संभावना भी जताई जा रही है। याचिका में राज्य में जल्द चुनाव कराने की मांग की गई है।