Homeअध्यात्मनवरात्र में क्यों जरूरी हैं सुरकंड़ा मंदिर के दर्शन!

नवरात्र में क्यों जरूरी हैं सुरकंड़ा मंदिर के दर्शन!

टिहरी गढ़वाल ;   जैसा कि हम सब जानते हैं कि भारत में उत्तराखंड़ राज्य को देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहां ऐसे कितने ही स्थान हैं जंहा देश भर के लोगों की बड़ी मान्यताएं हैं और यहां दर्शन करने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं इसी प्रकार ऐसा ही एक मंदिर सुरकंड़ा देवी का है जहां मान्यता है कि देवी सती का सिर गिरा था और ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर के दर्शन करने से सारे पाप मिट जाते हैं। मान्यताओं में है कि जब राजा दक्ष ने कनखल में यज्ञ का आयोजन किया तो उसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन भगवान शिव को आमंत्रित नही किया तो शिव के मना करने पर भी शिव की पत्नी व राजा दक्ष की पुत्री सती यज्ञ में चली गई वहां उसका अपमान हुआ और वह यज्ञकुंड में कूद गई। इस पर शिव ने क्रोधित होकर सती का शव त्रिशूल में लटकाकर हिमालय में चारों ओर घुमाया। फिर भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर सती का सिर सुरकुट पर्वत पर गिरा तब से इस जगह का नाम सुरकुट पड़ा जो बाद में सिद्वपीठ सुरकंडा के नाम से प्रसिद्व हुआ।
सुरकंडा मंदिर का महत्तव
ऐसा माना जाता है कि सुरकंडा मंदिर इकलौता एक ऐसा मंदिर है जहां गंगा दशहरे के मौके पर मेला लगता है। सिद्ध पीठ के पीछे एक और मान्यता भी जुड़ी है कि जब राजा भागीरथ गंगा को पृथ्वी पर लाए थे तो उस समय शिव की जटाओं से गंगा की एक धारा निकलकर सुरकुट पर्वत पर गिरी। इसका प्रमाण के रूप में मंदिर के नीचे की पहाड़ी पर जलस्रोत फूटता है। दशहरे व नवरात्र पर मां के दर्शनों का विशेष महत्व बताया गया है। इन अवसरों पर मां के दर्शन करने से समस्त पाप मिट जाते हैं।
मां सुरकंडा मंदिर जाने के लिए हर जगह से वाहनों की सुविधा है। मंदिर के नीचे कद्दूखाल तक वाहनों से पहुंचना पड़ता है और उसके बाद करीब डेढ़ किमी की खड़ी चढ़ाई चढ़कर मंदिर पहुंचते हैं। कद्दूखाल से मंदिर आने-जाने के लिए घोड़े भी उपलब्ध रहते है और अब रोप-वे भी बन रहा है।
बाहर से आने वाले यात्री ऋषिकेश से चम्बा 60 किमी, चम्बा से कद्दूखाल 20 किमी वाहन से आ सकते हैं। वाहन दिन में हर समय मिल जाते हैं। इसके अलावा देहरादून से मसूरी होकर करीब 60 किमी की दूरी तय कर कद्दूखाल पहुंच सकते हैं। मुख्य रेल मार्ग हरिद्वार व देहरादून है। जबकि नजदीकी हवाई अड्डा जौलीग्रांट है।मौसम-सिद्धपीठ मां सुरकण्डा का मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। यहां कभी भी आ सकते हैं। यहां हमेशा मौसम ठंडा रहता है, लेकिन दिसंबर, जनवरी और फरवरी माह में ठंड अधिक रहती है।

 

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