Homeअध्यात्मक्यों दीवाली की रात खेला जाता है जुआ, शास्त्र क्या कहते हैं!

क्यों दीवाली की रात खेला जाता है जुआ, शास्त्र क्या कहते हैं!

दिवाली को चंद रोज ही बचे हैं और लोगों की जुवां पर फिर से जुआ का जिक्र शुरू होने लगा है हमारे समाज की बड़ी ही पुरानी प्रथा है कि दिवाली की रात जुआ खेला जाता है। दीवाली पर जुआ खेलना भी इस पर्व से जुड़ा एक नकारात्मक पक्ष है, मान्यताओं के अनुसार दिवाली के दिन भगवान शिव और पार्वती ने भी जुआ खेला था, तभी से ये प्रथा दिवाली के साथ जुड़ गई है।
जुआ एक ऐसा खेल है जिससे इंसान तो क्या भगवान को भी कई बार भयंकर मुसीबतों का सामना करना पड़ा है। जुआ, सामाजिक बुराई होकर भी भारतीय मानस में गहरी पैठ बनाए हुए है।
जुआ एक ऐसा खेल है जिसके चलते कितने ही महारथियों को अपना सब कुछ दाव पर लगाना पड़ गया यही नहीं घर-बार तक छोड़ना पड़ा, हमारे सामने इतिहास के कितने ही ऐसे किस्से हैं जिन्होंने अपना सब कुछ गंवाया था।

पत्नी तक को हार गए थे
दुर्योधन ने शकुनि के साथ मिलकर पांडवों से कपट किया और जुएं में पूरा इंद्रप्रस्थ जीत लिया। युधिष्ठिर दांव पर दांव लगाते रहे और हारते रहे। आखिरी में खुद को, चारों भाइयों को और पत्नी द्रौपदी को भी हार गए. द्रौपदी का चीरहरण हुआ। फिर पांडवों को 13 साल के लिए वनवास पर जाना पड़ा, एक जुएं के खेल ने उनकी सारी जिंदगी बदल दी।
ज्ञात हो कि महाभारत में एक स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि अगर युधिष्ठिर में जुआ खेलने की आदत ना होती तो उन्हें भगवान का दर्जा मिल जाता, क्योंकि उनमें बाकी सारे गुण मौजूद थे, लेकिन जुएं की लत के कारण उनके सारे गुण दब गए।

भारत में मुगलों से पहले भी था जुआ
पौराणिक काल के बाद आधुनिक भारत में भी जुएं और जुआ घरों के साक्ष्य मिलते हैं। मदिरालय, वेश्यालयों में अक्सर जुआ खेला और खिलाया जाता था। सिकंदर के भारत पर आक्रमण के समय भी कई स्थानों पर जुआघर होने और जुआ खेलने के उल्लेख मिलते हैं।

जुए का स्वरुप कैसे बदलता गया
क्या आप जानते हैं कि सबसे पहले पत्थर या लकड़ी की गोट से चैसर खेला जाता था, इसका नाम चैसर इसके आकार के कारण पड़ा, यह चार भाग वाला होता था और हर भाग में 16 खाने होते थे, इस तरह कुल 64 खाने पूरे चैसर में होते थे। प्रारंभिक काल में इसे सिर्फ मनोरंजन के लिए खेला जाता था, इसके लिए सफेद पत्थर के पासे बनाए जाते थे, जिन पर 1 से 6 तक अंक लिखे होते थे।                                                                                            वर्तमान समय में ताश के पत्तों से जुआ खेला जाता है, कई प्रदेशों में दीपावली की रात घरों में जुआ खेला जाता है, इसे कई लोग शुभ और लक्ष्मी के आगमन का संकेत मानते हैं, लेकिन धर्मग्रंथों ने सीधी घोषणा की है कि जुआ एक व्यसन है, जहां व्यसन होते है वहां लक्ष्मी का वास नहीं होता।

जुआ खेलने का अंजाम-                                                                                                         जो लोग जुआ खेलते हैं, उनके लिए धर्मग्रंथों में कई प्रकार की सजाएं लिखी गई हैं, गरुड़ पुराण, भागवत, महाभारत जैसे ग्रंथों में जुए के नुकसान बताए गए हैं, इसे खेलने वाले को बहुत कठिन यातनाओं से गुजरना होता है।  पुराण के अनूसार जुआ खेलने वाला, जुए में छल करने वाला रौरवादि नरकों में जाता है और कई वर्षों तक यातना पाता है। जुआ खेलने वाले के घर से लक्ष्मी का वास खत्म हो जाता है, उसके घर में धन भले ही रहे, लेकिन श्री (सुख, वैभव, ऐश्वर्य) चली जाती है।

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