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उत्तराखंड में हो रहा है विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का गंभीर उल्लंघन

जिस उत्तराखंड राज्य में हर साल सड़क दुर्घटनाओं की वजह से हर साल 900 मौतें हो जाती है, उसी उत्तराखंड राज्य में ट्रामा केन्द्रों की संख्या बहुत कम है। सिर्फ इतना ही नहींदुर्घटना के शिकार लोगों के लिए राज्य में केवल प्राथमिक स्तर के ट्रामा केंद्र हैं जहां केवल बुनियादी सुविधाए ही उपलब्ध हैं । हालात यह है की उत्तराखंड के तीन महत्वपूर्ण जिले – हरिद्वार, पिथौरागढ़ और रुद्रप्रयाग (जिस मार्ग से बद्रीनाथ -केदारनाथ के तीर्थयात्रियों गुजरते हैं) में ‘कोई भी ट्रामा केंद्र नहीं है’।

उत्तराखंड में हो रहा है विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का गंभीर उल्लंघन

उत्तराखंड में चकित्सा व्यवस्था का यह हाल सीधे तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों का गंभीर उल्लंघन है, जिसके अनुसार दुर्घटना के मरीज़ को 50 किमी से अधिक तक नहीं पहुंचाया जाना चाहिए और प्रत्येक 100 किमी के बाद उचित ट्रामा सेण्टर की व्यवस्था होनी चाहिए। दुर्घटनाओं के पीड़ितों को प्रभावी सेवाएं प्रदान करने के लिए स्वास्थ्य विभाग की गंभीरता को इस तथ्य से मापा जा सकता है कि विकासनगर से त्यूनी तक लगभग 128 किलोमीटर की दूरी पर “कोई भी ट्रामा केंद्र नहीं है” जबकि इस खंड में परिवहन विभाग के अनुसार ‘110 अति दुर्घटना संवेंदंशील स्थान है ‘।

“उत्तराखंड में आघात केंद्रों की कमी के पीछे मुख्य कारण डॉक्टरों की अनुपलब्धता है कि हमारे पास पर्याप्त डॉक्टर होने पर इस तरह की समस्याएं हमारे द्वारा सर्वोच्च प्राथमिकता से दूर की जाएंगी। वर्तमान में राज्य में 12 आघात केंद्र हैं, जो राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है लेकिन उनमें से ज्यादातर विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से ग्रस्त हैं, जिनके कारण उनका परिणाम कम प्रभावी हो जाता है, हालांकि हमने संकट की स्थिति को संभालने के लिए इन केंद्रों में प्रयाप्त संख्या में पैरामीडिकल स्टाफ तैनात किए हैं। ” : निदेशक, स्वास्थ्य  डॉ डीएस रावत ।

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