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उत्तराखंड में कबूतरबाजी का जाल, पुलिस ने की कार्यवाही

उत्तराखंड पुलिस को कल उस समय बड़ी सफलता मिली जब उन्होंने पहाड़ के दर्जनों बेरोजगारों को विदेश भेजने के नाम पर ठगी करने वाले शातिर कबूतरबाज साहिल को को मच्छी बाजार, देहरादून से गिरफ्तार कर लिया।

शातिर जॉर्जिया, दुबई व रूस समेत अन्य देशों में नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये ठगता था। पैसे वापस मांगने पर वह उन्हें जानमाल की धमकी भी देता था। एसएसपी के आदेश के बाद साहिल, रॉबिन कुमार, गुरप्रीत व अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। पुलिस के मुताबिक साहिल ने कोतवाली के मच्छी बाजार में ग्रीन्सलैंड कंसलटेंसी के नाम से ऑफिस भी खोल रखा था, रविवार को साहिल इसी ऑफिस में अपने कुछ दस्तावेज समेटने आया था। मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

क्या है लूटने का तरीका।

यह कबूतरबाज जिस प्रदेश में अपना काम करते हैं वहां पर बहुत कम समाचार पत्रों में अपना विज्ञापन देते हैं और जयादा दुसरे प्रदेशों में लुभावने विज्ञापन देकर विदेश जाने के इच्छुक लोगों को आकर्षित करते हैं। जैसे कि विजा लगाने की कोई फीस नहीं होती पैसे विजा लगने के बाद मासिक वेतन से कटवा सकते हैं। जब कोई विदेश जाने का इच्छुक इन के पास आता है तो यह उस से फाईल तैयार करने के नाम पर 3000 से 6500 तक लेते हैं और उस को 30 से 60 दिन का समय देते हैं कि आपका विजा लग जाएगा। उस के कुछ दिन के बाद यह ग्राहक को डाक्टोरी जांच के बहाने बुला कर उस से 4500 से 6500 रुपय तक और मांग लेते हैं इस के बाद ग्राहक के कागजात में कोई भी कमी निकाल कर उस को बोल देते हैं कि तुम्हारा विजा कैंसिल हो गया है। जिस से ग्राहक कभी कभी तो अपनी ही गलती मान कर अपने पैसे और वक्त गंवा बैठता है और अगर कभी पुलिस के पास चला भी जाए तो सब से पहले पुलिस वाले ही उस को यह पूछ लेते हैं कि तुम्हारे पास क्या साबुत है कि तुम ने किसी को पैसे दिए हैं क्योंकि ऐसे कबूतरबाज ग्राहक को रसीद नहीं देते हैं और जो रसीद देते हैं वो बिना रजिस्ट्रेशन नंबर,वाली होती है या बाजार में मिलने वाली रसीद बुक पर स्टेम्प लगा कर देते हैं अगर फिर भी पुलिस कोई कारवाही करती भी है तो यह कबूतरबाज तब तक अपना दफ्तर छोड़ कर भाग जाते हैं और इन कबूतरबाजों का कोई रिकॉर्ड पुलिस या बिल्डिंग के मालिक के पास भी नहीं होता। यह लोग किसी भी तरह का वीजा नहीं लगा पाते इन के पास रजिस्ट्रेशन फीस के नाम पर 2000 और मेडिकल जांच के नाम पर 4500 से 6500 तो बन ही जाते हैं।

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