
देहरादून शैली श्रीवास्तव- सावन में शिव आराधना का बड़ा महत्व है। इस दौरान जगह-जगह कांवड़ियों की लम्बी कतारें बम-बम भोले के जयकारे लगाते हुए दिखतीं है। क्या आप जानते हैं श्रद्धा से जुड़ी इस परंपरा की शुरुआत कब और किसने की ? अगर नहीं, तो यहां जानें कांवड़ यात्रा से जुड़ी मन्यताओं के बारे में….
मान्यता है कि सबसे पहली कांवड़ हरकी पौड़ी पहुंचे भगवान विष्णु के पांचवें अवतार परशुराम ने यहां से उठाई थी। त्रेता युग में हुई शुरुआत से आज तक वर्ष में दो बार कांवड़ यात्रा चल रही है। देश के अधिकांश शिवालयों में हरकी पौड़ी से ले जाए गए शिवलिंग ही विराजमान हैं। भगवान परशुराम के नाम पर ही हरकी पौड़ी का नाम ब्रह्मकुंड पड़ा था। विभिन्न धर्म ग्रंथों के अनुसार राजाओं का दमन करने के बाद परशुराम जब अपने मयराष्ट्र पहुंचे तब ब्रह्मकुंड से आकाशवाणी हुई कि इसी राष्ट्र में मेरा लिंग स्थापित किया जाए। तब परशुराम हरकी पौड़ी गंगातट पर पहुंचे और गंगा से पाषाण यपत्थरद्ध उठाने लगे। जैसे ही परशुराम ने गंगा के पत्थरों को बाहर निकालाए पत्थर रोने लगे। पत्थरों ने कहा कि गंगा हमारी माता है, हमें मां से अलग न करो। भगवान परशुराम का भी दिल पसीज गया। उन्होंने मां गंगा की आराधना शुरू की। गंगा मा प्रकट हुई और परशुराम से आगमन का कारण पूछा। परशुराम ने बताया कि गंगा से एक पाषाण लेकर अपने वतन मयराष्ट्र में स्थापित करना चाहते हैं। यह पत्थर साथ जाने को तैयार नहीं है। तब गंगा ने पत्थरों को आश्वासन दिया कि वे उनसे दूर नहीं रहेंगे। परशुराम ने आश्वस्त किया वे प्रत्येक फागुन और श्रावण में इसी तरह हरकी पौड़ी से गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाएंगे। बाद में परशुराम ने एक पाषाण लेकर मयराष्ट्र वर्तमान में पुरा माहदेव में स्थापित किया। बाद में गंगा से अनेक पाषाण लेकर परशुराम ने देश के विभिन्न शिवालयों में स्थापित किए। तब से दोनों कांवड़ यात्रा के दौरान पहली कांवड़ भगवान परशुराम ही चढ़ाते हैं। कांवड़ यात्रा में सबसे बड़ा मेला बागपत के पुरा माहदेव में ही भरता है। भगवान परशुराम ने जो शिवलिंग पुरा महादेव में स्थापित किया था उसकी स्थापना का मुहूर्त भगवान वाल्मीकि ने ही निकाला था।



