देहरादून: उत्तराखंड में स्थित पंडित दीन दयाल उपाध्याय राजकीय कोरोनेशन अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हाल ही में प्रियंका चौहान नाम की एक युवती को इलाज के दौरान जिन कठिनाइयों और देरी का सामना करना पड़ा, उसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को सामने ला दिया है। यह मामला अस्पताल की कार्यप्रणाली और आपातकालीन सेवाओं की स्थिति पर चिंता बढ़ाने वाला है।
उपचार से पहले पूरी कराई गई औपचारिकताएँ
जानकारी के मुताबिक, प्रियंका चौहान गंभीर हालत में अस्पताल की इमरजेंसी में पहुंचीं। लेकिन तुरंत उपचार शुरू करने के बजाय उन्हें इमरजेंसी से ऑर्थोपेडिक विभाग भेज दिया गया। वहां भी इलाज शुरू करने से पहले बिलिंग प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया। इसके बाद एक्स-रे के लिए भेजा गया, जहां फिर से बिल जमा करने की औपचारिकता करनी पड़ी। एक्स-रे रिपोर्ट आने के बाद प्लास्टर कराने से पहले भी अलग से बिलिंग कराई गई। इन सभी चरणों से गुजरने के बाद ही उनका प्लास्टर किया जा सका।
आपातकालीन व्यवस्था पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर कोई मरीज जीवन-मृत्यु की स्थिति में हो तो क्या इस तरह की लंबी प्रक्रिया उसके लिए खतरनाक साबित नहीं हो सकती? आपातकालीन सेवाओं का उद्देश्य मरीज को तुरंत प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराना होता है, लेकिन यहां मरीज और परिजनों को अलग-अलग विभागों और बिलिंग काउंटरों के चक्कर लगाने पड़े, जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं की हालत खस्ता
अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं बताई जा रही है। व्हीलचेयर जर्जर हालत में थीं और उन्हें चलाने में भी परेशानी हो रही थी। इसके अलावा स्वच्छता व्यवस्था भी ठीक नहीं पाई गई। मरीजों और उनके तीमारदारों को सही जानकारी और सहयोग न मिल पाने से उन्हें अतिरिक्त परेशानियों का सामना करना पड़ा। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए सरकारी अस्पताल ही सबसे बड़ा सहारा होते हैं, ऐसे में इस तरह की अव्यवस्था चिंता का विषय है।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग से मांग
अगर सरकारी अस्पतालों में इसी तरह की लापरवाही बनी रही तो आम लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार और संबंधित स्वास्थ्य विभाग से मांग की गई है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही आपातकालीन सेवाओं में “ट्रीटमेंट फर्स्ट, बिलिंग लेटर” की व्यवस्था लागू की जाए, विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए और अस्पताल में व्हीलचेयर, स्ट्रेचर, साफ-सफाई व अन्य जरूरी सुविधाओं का जल्द सुधार किया जाए। साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक मरीज का नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा है।



