हिमालयी कॉन्क्लेव में गहन मंथन के बाद हिमालयी राज्यों ने ‘मसूरी संकल्प’ पारित किया है। इसमें पर्वतीय राज्यों ने हिमालय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और देश की समृद्धि में योगदान का संकल्प लिया। इसके साथ ही प्रकृति प्रदत्त जैव विविधता, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों के संरक्षण का भी प्रण लिया गया।
बुनियादी सुविधाओं से रुकेगा पलायन
हिमालयी कॉन्क्लेव की मुख्य अतिथि केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि ऐसे आयोजन की लम्बे समय से इसकी आवश्यकता महसूस की जा रही थी। सभी हिमालयी राज्यों का विकास भारत सरकार की प्राथमिकताओं में है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दूरस्थ क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा कर ही पलायन को रोका जा सकता है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोग देश की सुरक्षा में आंख और कान का काम करते हैं। इससे सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कॉन्क्लेव में आए प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें गर्व है कि देश की सीमाओं की चौकसी की जिम्मेदारी मिली है। हिमालय राज्यों के सम्मेलन की मेजबानी का अवसर प्राप्त हुआ है यह उत्तराखण्ड के लिए सम्मान की बात है। हिमालय राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियां समान हैं। मुझे आशा है कि देश की समृद्धि में योगदान करने के लिए यह एक अच्छा मंच साबित होगा।
सम्मेलन में उठाई बातों से सहमत वित्त आयोग
15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एनके सिंह ने हिमालयी कॉन्क्लेव को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अपनी साझा समस्याओं को रखने व उनके हल के लिए नीति निर्धारण में यह एक महत्वपूर्ण प्लेटफार्म साबित होगा। केन्द्र भी हिमालयी राज्यों के साथ है। वित्त आयोग हिमालयी राज्यों की समस्याओं से भली-भांति अवगत है। सम्मेलन में उठाई गई बातों से वित्त आयोग भी सहमत है।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि कि हिमालयी राज्यों में विकास की बहुत संभावनाएं हैं। इसके लिए हमें टारगेट सेट करने की आवश्यकता है। पर्यटन की संभावनाओं की दृष्टि से भी सभी हिमालयी राज्य बहुत ही समृद्ध है। अभी यहां घरेलू पर्यटकों की अधिकता है।
छोटे राज्यों को वित्तीय सहायता में प्राथमिकता की मांग
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में जीवन अत्यंत कठिन होता है। यहां की समस्याएं अन्य राज्यों से अलग हैं। उन्होंने पर्वतीय क्षेत्रों में रेल और हवाई कनेक्टिविटी विकसित किए जाने की आवश्यकता बताई। छोटे राज्यों के सीमित संसाधनों को देखते हुए केन्द्र द्वारा वित्तीय सहायता में प्राथमिकता देने की मांग की।
मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड कोंगकल संगमा ने कहा कि हिमालयी राज्यों में विकास योजनाओं की लागत अधिक होती है। इसलिए केन्द्र द्वारा विभिन्न विकास योजनाओं के मानकों में इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। आर्थिक विकास व पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखना, हिमालयी राज्यों की दोहरी जिम्मेदारी होती है। हमें सतत विकास के लिए रिस्पॉंसिबल टूरिज्म पर फ़ोकस करना होगा। उन्होंने पर्वतीय राज्यों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की आवश्यकता पर बल दिया।
ईको सिस्टम सर्विसेज पर दिया जाए विशेष ध्यान
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो ने सम्मेलन को बेहतर शुरुआत बताते हुए पर्वतीय क्षेत्रों में आजीविका संवर्द्धन व इको सिस्टम के महत्व पर जोर दिया। अरुणाचल के उप मुख्यमंत्री चोवना मेन ने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं के विकास पर विशेष ध्यान देना होगा।
मिजोरम के मंत्री टीजे लालनुनल्लुंगा ने अपने सम्बोधन में प्राकृतिक आपदा, जैव विविधता संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी, डिजिटल कनेक्टिविटी पर जोर दिया. सिक्किम के मुख्यमंत्री के सलाहकार डॉक्टर महेन्द्र पी.लामा ने केन्द्रीय सहायता में ईको सिस्टम सर्विसेज को विशेष भार दिए जाने की बात कही।
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार केके शर्मा, आईआईएफएम की डॉक्टर मधु वर्मा व सुशील रमोला ने भी विचार व्यक्त किए। सम्मेलन के समापन अवसर पर उत्तराखण्ड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
इन मुद्दों पर बनी सहमति
– हिमालयी राज्य केंद्र के जल शक्ति संचय मिशन में प्रभावी योगदान देंगे।
– नदियों के संरक्षण-पुनर्जीवन को केंद्र पोषित योजनाओं में ज्यादा बजट मिले।
– नए पर्यटक स्थल विकसित करने को केंद्र से आर्थिक सहायता मिले।
– पर्यावरणीय सेवा के लिए हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस दिया जाए।
– हिमालयी राज्यों का कान्क्लेव अब हर साल आयोजित किया जाएगा।
– पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों के मद्देनजर अलग से योजनाएं बनें।
– आपदा प्रबंधन के लिए मौजूदा तंत्र को और मजबूत किया जाए।


