देहरादून {शैली श्रीवास्तव} – कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के सर्वाधिक रणबांकुरों ने दुश्मन को देश की सरहद से बाहर खदेड़ते हुए अपने प्राणों को न्यौछावर किया। राज्य के 75 रणबांकुरें कारगिल युद्ध में शहीद हुए। राज्य के 30 सैनिकों को उनके अदम्य साहस के लिए वीरता पदकों से अलंकृत किया। राज्य की कुमाऊं और गढ़वाल रेजिमेंट ने कारगिल युद्ध में दुश्मन को मार भगाने में अहम योगदान दिया है। कारगिल ऑपरेशन में गढ़वाल राइफल्स के 47 जवान शहीद हुए थे, जिनमें 41 जांबाज उत्तराखंड मूल के ही थे। वहीं कुमाऊं रेजीमेंट के भी 16 जांबाज भी शहीद हुए थे। शहादत का वह जज्बा आज भी पहाड़ भुला नहीं पाया है। गढ़वाल रेजीमेंटल सेंटर के परेड ग्राउंड पर हेलीकॉप्टर से शहीदों के नौ शव एक साथ उतारे गए, तो मानो पूरा पहाड़ अपने लाडलों की याद में रो पड़ा था। कारगिल युद्ध में भाग लेने वाली लगभग हर रेजिमेंट में उत्तराखंड के बहादुर सैनिक शामिल थे। इसमें भारतीय सेना ने 527 सैनिकों को खोया तो वहीं 1363 गंभीर रूप से घायल हुए थे।
देश की सुरक्षा और सम्मान के लिए देवभूमि के वीर सपूत हमेशा ही आगे रहे हैं। इन युवाओं में सेना में जाने का क्रेज आज भी बरकरार है। यही कारण है कि आइएमए से पासआउट होने वाला हर 12वा अधिकारी उत्तराखंड से है। वहीं भारतीय सेना का हर पाचवा जवान भी इसी वीरभूमि में जन्मा है। देश में जब भी कोई विपदा आई तो यहा के रणबांकुरे अपने फर्ज से पीछे नहीं हटे। वर्ष 1999 में भारतीय सेना ने पड़ोसी मुल्क की सेना को चारों खाने चित कर विजय हासिल की। कारगिल योद्धाओं की बहादुरी का स्मरण करने व शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए 26 जुलाई को प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। अति दुर्गम घाटियों व पहाड़ियों में देश की आन-बान और शान के लिए भारतीय सेना युवायुसेना समेतद्ध के 527 जवान शहीद हुए थे।
