
शैली श्रीवास्तव- भगवान शिव शंकर के देशभर में ही नहीं बल्कि पूरे विश्वभर में कई प्राचीन मंदिर हैं जिनका इतिहास रामायण, महाभारत से जुड़ा हुआ है। ऐेसा ही भोलेनाथ का एक प्राचीन मंदिर देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी स्थित है। इसका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है, यही कारण है कि यह मंदिर अपने आप में खास माना जाता है। देहरादून से सात कि.मी की दूरी पर टपकेश्वर मंदिर स्थित है। बाबा के इस धाम पर देशभर से कई लोग दर्शन करने आते हैं। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक मान्यता है कि आदिकाल में भगवान शंकर ने यहां देवताओं की प्रार्थना से प्रसन्न होकर उन्हें देवेश्वर के रूप में दर्शन दिए थे।
ऐसी मान्यता है कि इसी जगह को द्रोणपुत्र अश्वत्थामा की जन्मस्थली व तपस्थली माना गया हैए जहां अश्वत्थामा के माता.पिता गुरु द्रोणाचार्य व कृपि की पूजा.अर्चना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया था। जिसके बाद ही उनके घर अश्वत्थामा का जन्म हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अश्वत्थामा ने अपनी माता कृपि से दूध पीने की इच्छा जाहिर की, जब उनकी यह इच्छा पूरी न हो सकी तब अश्वत्थामा ने घोर तप किया। जिससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने वरदान के रूप में गुफा से दुग्ध की धारा बहा दी। तब से ही यहां पर दूध की धारा गुफा से शिवलिंग पर टपकने लगी, जिसने कलियुग में जल का रूप ले लिया। इसलिए यहां भगवान भोलेनाथ को टपकेश्वर कहा जाता है।
मान्यता यह भी है कि अश्वत्थामा को यहीं भगवान शिव से अमरता का वरदान मिला। उनकी गुफा भी यहीं है जहां उनकी एक प्रतिमा भी विराजमान है। टपकेश्वर मंदिर के आस-पास अन्य देवी,देवताओं के मंदिर भी है।
टपकेश्वर मंदिर में वैसे तों भक्तों का आना जाना लगा रहा है लेकिन श्रावण, और शिवरात्रि पर इस मंदिर का नजारा कुछ ओर ही देखने कों मिला है श्रावण माह के सोमवार कों मंदिर कों अनेक तरह के फूलो से सजाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रावण माह में यहां नागराज स्वय शिवलिंग पर विराजमान हो जाते है और भक्तों कों दर्शन देते है, वहीं शिवरात्रि पर भी मंदिर में काफी रौनक देखने कों मिली है।