बच्चों पर मोबाइल से होने वाले दुष्प्रभाव!

हमेशा बच्चों को कठोर सुपर वीजन के तहत ही मोबाइल, टेबलेट और स्मार्ट फोन का उपयोग ही करने देना चाहिए। बच्चों के निजी उपयोग के लिए तो फोन बिल्कुल ही नहीं देना चाहिए। इस बिषय के बारे में अनेक रिसर्चाे के बाद इस बारे में पता चला है कि टेक्नोलाॅजी बच्चों को फायदा पहुँचाने की बजाय लांग टर्म में नुकसान पहुंचा रही है। फिर भी माता पिता बच्चों को इसका उपयोग करने को दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसके उपयोग से बच्चे स्मार्ट बन रहे हैं और वो बिजी रहते हैं। आज के समय में लोग नवजात शिशुओं और टोडलर्स तक भी इस डिवाइस को रखने लगे हैं। जिसके कारण बच्चों के विकास, व्यवहार और उनके सिखने की क्षमता पूरी तरह से प्रभावित हो रही है। आइये विस्तार से जाने बच्चों पर मोबाइल और टेबलेट से होने दुष्प्रभाव के बारे में।

विकास का धीमा होना: आज के समय में हमारे पास कुछ ऐसी टेक्नोलाॅजी है जो बच्चों के विकास को सिमित कर देती है। जिसके कारण उसका शारीरिक विकास पिछड़ सकता है। जब बच्चा पिफजिकल एक्टिविटी करता है तब बच्चा फोकस करना सिखता है और नई स्किल्स डेवलप करते हैं। लेकिन अगर आपका बच्चा बारह साल की कम उम्र का हैं तो उसका टेक्नोलाॅजी में दखल देना उसके विकास व शैक्षणिक प्रगति के लिए हानिकारक सिद्द होता है।
मोटापा बढ़ना:  जो बच्चें यह डिवाइसेज अपने कमरे में ही बैठ कर उपयोग करते हैं। उनमे मोटे होने का रिस्क 30 प्रतिशत तक अध्कि पाया जाता है। मोटे बच्चों में भी 30 प्रतिशत को डायबिटीज होने का और दिल के दौरे का खतरा बढ़ जाता है। यह खतरे उनकी लाइफ एक्स्पेक्टेंसी को कम करते हैं।

नींद में कमी का होना: लगभग 60 प्रतिशत माता पिता अपने बच्चों के टेक्नोलाॅजी के इस्तेमाल की निगरानी नहीं करते और लगभग 75 प्रतिशत लोग अपने बच्चों को बेडरूम में ही टेक्नोलाॅजी इस्तेमाल करने की छूट से दस साल की उम्र के इन बच्चों की नींद टेक्नोलाॅजी के दखल के कारण प्रभावित हो रही है। जिसके कारण बच्चों की स्टडीज प्रभावित होती है।
मानसिक रोग: अगर बच्चें टेक्नोलाॅजी का अनियंत्रित उपयोग से बच्चों में डिप्रेशन, एंजाइंटी, अटेचमेंट डिसार्ड, ध्यान का नहीं लगना, आटिज्म, बाइपोलर जैसी समस्याएँ उनमे बढ़ सकती है। इसलिए जितना हो सकें बच्चों को मोबाइल जैसी वस्तुओं से दूर रखना चाहिए।
आक्रामकता: आक्रामकता मीडिया, टीवी, फिल्मों और गेम्स में हिंसा बहुत अधिक दिखाई देता है। जिसके कारण बच्चों  में आक्रामकता बहुत बढ़ जाती है। आजकल छोटे बच्चे शारीरिक और लैंगिक हिंसा के प्रोग्राम और गेम्स के संपर्क में आ जाते हैं। जिसमें हत्या, बलात्कार और टार्चर के दृश्य की भरमार होती है। मिडिया में दिखाई देने वाला हिंसा अमेरिका में पब्लिक हेल्थ रिस्क की श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि यह बच्चों के विकास को विकृत करती है।
लत लगना: जिस समय माता पिता अपने स्वय के किसी काम में खोये रहते है तब वे अपने बच्चों से भावनात्मक आधार पर दूर होने लगते हैं। बच्चों के बेहतर विकास के लिए जरूरी होता है कि माता पिता अपने बच्चों को समय दें। जिस समय बच्चे अपने माता पिता की कमी को महसूस करते हैं तब वह टेक्नोलाॅजी व इन्पफार्मेशन के भाव में पूरी तरह से खो जाते हैं और यहीं उनकी लत बन जाती है। टेक्नोलाॅजी का भरपूर इस्तेमाल करने वाले लगभग 10 प्रतिशत बच्चे इसकी लत का शिकार बन गये हैं।

रेडिएशन का खतरा:  टोरंटो विश्वविद्यालय के स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ के डाॅ. एंथोनी मिलर ने अपनी रिसर्च में बताया कि रेडियो फ्रीक्वेंसी एक्सपोजर के आधार पर 2B कैटेगरी को नहीं बल्कि 2A कैटेगरी को कैंसर कारक मानना चाहिए। लेकिन टेक्नोलाॅजी को हद से ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों का भविष्य धूमिल है।
आँखों पर दबाव: मोबाइल फोन हो या इसी प्रकार का कोई गैजेट्स इसका दुष्प्रभाव सबसे पहले बच्चों की आँखों पर देखने को मिलता है। इसका कारण यह है कि वे बैकलित स्क्रीन को घंटों तक देखते रहते हैं और अपनी पलको को भी नहीं झपकाते। अगर आप अपने बच्चों की भलाई चाहते हो तो आधे घंटे से उपर उन्हें किसी भी स्क्रीन को नहीं देखने देना चाहिए और जितना हो सकें उन्हें मोबाइल से दूर रहना चाहिए।

 

 

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