देहरादून: उत्तराखंड में मदरसों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की सरकार की कोशिश को फिलहाल बड़ा झटका लगता दिख रहा है। मदरसा बोर्ड खत्म होने के बाद नई व्यवस्था के तहत मदरसों को शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता लेने के लिए तीन महीने का समय दिया गया था, लेकिन एक महीने से ज्यादा समय बीतने के बावजूद अब तक सिर्फ सात मदरसे ही मान्यता हासिल कर पाए हैं।
राज्य में मदरसा बोर्ड से जुड़े रहे कुल 452 मदरसों में से अभी तक महज सात मदरसों को नई व्यवस्था के तहत मान्यता मिली है। यानी करीब एक फीसदी से भी कम मदरसे इस प्रक्रिया को पूरा कर पाए हैं। वहीं, जांच के दौरान कुछ मदरसों ने मान्यता लेने से साफ इनकार कर दिया, जबकि कुछ संस्थानों ने जांच टीम को जरूरी जानकारी तक उपलब्ध नहीं कराई।

जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया?
देहरादून के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की ओर से अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में कई अहम बातें सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मदरसों ने जांच टीम को जानकारी देने से ही इनकार कर दिया। वहीं कुछ संस्थानों ने स्पष्ट तौर पर कहा कि वे शिक्षा विभाग और अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से नई मान्यता नहीं लेंगे। कुछ मदरसे ऐसे भी हैं जो मान्यता के लिए जरूरी दस्तावेज और पत्रावली तैयार करने की बात कह रहे हैं। हालांकि, अभी तक बड़ी संख्या में संस्थान निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पाए हैं।
ऊधमसिंह नगर में सभी आवेदन रद्द
मान्यता प्रक्रिया की स्थिति अलग-अलग जिलों में अलग है। ऊधमसिंह नगर में 11 मदरसों ने शिक्षा विभाग के पास मान्यता के लिए आवेदन किया था, लेकिन मानक पूरे नहीं होने के कारण सभी आवेदन निरस्त कर दिए गए।
वहीं हरिद्वार में 18 मदरसों में से सात को मान्यता मिल चुकी है। इसके अलावा देहरादून और नैनीताल में मान्यता को लेकर अभी बैठक तक नहीं हो सकी है। यानी एक तरफ सरकार नई शिक्षा व्यवस्था को तेजी से लागू करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में मदरसों का मान्यता प्रक्रिया से बाहर रहना प्रशासन के लिए चिंता का विषय बन गया है।
30 सितंबर तक का समय, फिर होगी कार्रवाई
मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को नई व्यवस्था के तहत मान्यता लेने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। यह समय सीमा 30 सितंबर को पूरी हो जाएगी। इसके बाद जो संस्थान मान्यता नहीं लेंगे या निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करेंगे, उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को रिपोर्ट भेजी जाएगी। ऐसे में अब मदरसों के सामने मूल रूप से दो विकल्प दिखाई दे रहे हैं—या तो निर्धारित मानकों को पूरा करते हुए मान्यता हासिल करें या फिर वहां पढ़ रहे बच्चों को मान्यता प्राप्त संस्थानों में शिफ्ट किया जाए।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती
सरकार की योजना सिर्फ मदरसा व्यवस्था में बदलाव तक सीमित नहीं है। अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के दायरे में मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय से जुड़े शिक्षण संस्थानों को भी लाने का उद्देश्य है। सरकार पारदर्शी और समान शिक्षा व्यवस्था की दिशा में इसे बड़ा कदम बता रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर मदरसों की कम भागीदारी इस बदलाव की राह में सबसे बड़ी चुनौती बनती दिखाई दे रही है।
अब नजर 30 सितंबर की समय सीमा पर है। उससे पहले कितने मदरसे मान्यता की प्रक्रिया पूरी करते हैं और कितने संस्थान नई व्यवस्था का विरोध या बहिष्कार करते हैं, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।