Homeराज्यउत्तर प्रदेशराजधानी समेत प्यासा है पूरा पहाड़!

राजधानी समेत प्यासा है पूरा पहाड़!

                                  रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून
                                   पानी गये न उबरे, मोती, मानुष, चून
देहरादून:- पानी की किल्लत लगातार जनसंख्या घनत्व के साथ गहराती जा रही है। लेकिन गंगा-यमुना का मायका इस दिक्कत से लगातार प्रभावित होता जा रहा है। राज्य गठन से पहले जहां हमारे गांव, तोक, मजरे, खाल सबके सब पानी से लबालब थे वहीं जनसंख्या घनत्व के साथ-साथ विकास की अंधी दौड़ में पानी के स्रोतों को समाप्त करना प्रारंभ कर दिया है। आज पानी दूर की कौड़ी होता जा रहा है।  राज्य गठन के 18 साल बाद गंगा यमुना, सरयू, गोमती जैसी नदियों का यह प्रदेश प्यासा का प्यासा है। ऐसा नहीं है कि पेयजल के लिए प्रयास नहीं हुए। पर्याप्त प्रयास होने के बावजूद योजनाएं या तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई अथवा उन पर अपेक्षित काम नहीं हुआ, जिसके कारण स्थिति धीरे-धीरे और बदतर होती जा रही है।
 उत्तराखंड जो नदियों  का उद्गम स्थल है वहीं पेयजल अभावग्रस्त क्षेत्रों की स्थिति यह है कि स्वयं जल संस्थान ने ही 1544 इलाकों को इस श्रेणी में रखा है। इनमें सबसे अधिक 391 क्षेत्र राजधानी देहरादून जिले के हैं, जहां की अधिकांश जलापूर्ति ट्यूबवेल पर निर्भर है।
अधिकारी नींद में, टैंकर वालों की चांदी
पेयजल आपूर्ति की इस कमी का लाभ टैंकर जलापूर्ति करने वाले उठा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में 135 लीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 70 लीटर पानी प्रति व्यक्ति प्रति दिन उपलब्ध कराना जल संस्थान की जिम्मेदारी है। गर्मियां प्रारंभ होते ही यह आपूर्ति धीरे-धीरे घटने लगती है जो 100 से 50-60 लीटर पर सिमट जाती है। आंकड़ गवाह है कि राजधानी देहरादून में प्रतिदिन लोगों को 59 एमएलडी पानी कम मिल रहा है। इसी कमी का लाभ उठाकर टैंकर स्वामी जनता लगभग छह करोड़ से अधिक वसूल रहे हैं।   जल संस्थान के पास महज तीन ही टैंकर हैं। इसमें दो टैंकर उत्तर जोन के पास हैं और एक टैंकर पित्थूवाला जोन के पास है। जल संस्थान की इसी कमी का लाभ उठाकर लगभग 2100 टैंकर जलापूर्ति के नाम पर अच्छे-खासे वारे-न्यारे कर रहे हैं।
167 सरकारी भवन संरक्षित करेंगे वर्षा जल 
सरकार ने भूजल पर बढ़़ते दबाव को देखते हुये वर्षा जल संग्रहण का प्रयास तो किया है लेकिन यह कितना प्रभावकारी होगा यह तो समय बताएगा, इसका कारण यहां की सभी नहरों को भूमिगत किया जाना है, साथ ही साथ झीलों और तालाबों का न होना भी भूजल संवर्धन की दिशा में महत्वपूर्ण कारक साबित हो रहा है। सरकार द्वारा दून के 167 सरकारी भवनों में भूजल संरक्षण का प्रयास किया जाएगा। शासन के निर्देश पर जल संस्थान ने दून में 167 सरकारी भवनों का चिह्नीकरण किया है और भवन परिसर में भूमिगत टैंक बनाने के लिए सर्वे का कार्य भी शुरू हो चुका है। इन सभी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की लागत करीब 20 करोड़ रुपये आंकी गई है।
 इस तरह चलता है पानी का धंधा
नगर के कई प्रमुख क्षेत्रों से यह टैंकर पेयजल उठाते हैं और सप्लाई करते हैं। इनमें कनक सिनेमा, नेहरू कॉलोनी, पित्थूवाला, सरस्वती विहार आदि के नाम शामिल है। देहरादून में भी पीने का पानी हर जगह शुद्ध नहीं है। केंद्रीय भूजल बोर्ड मानता है कि कुछ स्थानों पर भूजल में नाइट्रेट व आयरन की मात्रा अधिक है। टैंकर जिन स्थानों से पानी ले जा रहे हैं उनमें से अधिकतर बोरवेल 150 से 200 फीट तक ही गहरी खुदाई वाले होते हैं जिनकी गुणवत्ता ही मानकों के अनुरूप है यह पक्ष प्रश्न है।
टैंकरों के धंधे पर एक नजर
सप्लायरों की संख्या 500 पार और टैंकर 2100 से अधिक।
एक टैंकर की क्षमता 3500-4500 लीटर।
प्रति टैंकर एक दिन में करीब 10 हजार लीटर पेयजल सप्लाई की जाती है।
सभी टैंकर प्रतिदिन 2.10 करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति करते हैं।
प्रतिदिन की कमाई करीब 20 लाख पार और एक माह में छह करोड़ रुपये से अधिक  
Vision Desk 3
Vision Desk 3http://vision2020news.com/
उत्तराखंड ताज़ा समाचार - Vision 2020 News gives you the Latest News, Breaking News in Hindi.Uttarakhand News, Dehradun News, Latest News, daily news, headlines, sports, entertainment and business from Uttarakhand, India.
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular