Tuesday, February 24, 2026
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यूपी का एक मंदिर जहां भगवान भोलेनाथ को झाड़ू चढ़ाया जाता है, होता है चमत्कार


सबसे बड़ा प्रदेश होने के नाते उत्तर प्रदेश कई मामलों में अन्य राज्यों से विशिष्ट है। मंदिरों की चर्चा की जाए तो यहां ऐसे-ऐसे मंदिर है जिनके चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। काशी, अयोध्या और मथुरा तो उत्तर प्रदेश में है ही, एक मंदिर ऐसा है जहां लोग भगवान शिव को झाड़ू अर्पित करते हैं। झाड़ू का नाम आते ही लोगों को आम आदमी पार्टी की याद आ जाती है, लेकिन यहां ‘आप’ से कोई लेना-देना नहीं है। यहां तो भगवान भोलेनाथ की महत्ता का ही वर्णन किया जा रहा है। भगवान भोलेनाथ इस मंदिर में भांग, धतूरा या अन्य मादक पदार्थ नहीं स्वच्छता करने वाली झाड़ू का अर्पण लेते हैं।

सावन के महीने में भक्त लोग भगवान शिव को अलग-अलग तरीके से मनाते हैं और उनकी उपासना करते हैं। कोई उनकी पूजा अनोखे तरीके से करता है तो कोई मन्नत लेता है। ऐसे ही भगवान शिव को खुश करने के लिए सिर्फ धतूरा और बिल्व पत्र ही काफी होता है जिससे भोले भंडारी खुश हो जाते हैं। देश में शिवजी के कई मंदिर हैं जहाँ पर भक्त लोग अलग-अलग वस्तुएं चढ़ाते हैं और उन्हें अपनी ओर से प्रसन्न करते हैं। लेकिन एक मंदिर ऐसा भी है जहाँ पर भगवान शिव को सिर्फ झाड़ू चढाई जाती है। जी हां, आज हम इसी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद ही जानते होंगे।

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के एक गांव बहजोई में भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है जिसका नाम है प्राचीन शिवपातालेश्वर मंदिर जहाँ दूर-दूर से लोग आते हैं और यहाँ आ कर भगवान को वो लोग सोना चांदी नहीं बल्कि झाड़ू चढ़ाते हैं। यहाँ के लोगों का मानना है कि भोलेनाथ को झाड़ू चढाने से त्वचा संबंधी रोग दूर होते हैं और भगवान शिव खुश होते हैं। इसी पर यहाँ के पुजारी का कहना है कि ये मंदिर करीब 150 साल पुराना है और झाड़ू चढाने की प्रथा कई सालों से चली आ रही है जिसे भक्त आज भी मानते हैं। इस मंदिर में भगवान की शिवलिंग मौजूद है जिसके दर्शन के लिए लाखों में भक्त आते हैं।
इसके पीछे की कथा कुछ ऐसी है कि इस गाँव में एक धनी रहता था जिसे त्वचा से जुड़ा रोग हो गया था जिसका इलाज सम्भव नहीं हुआ। जब ये धनी इलाज के जा रहा था तो मंदिर में जा कर एक महंत से टकरा गया तो झाड़ू मार रहा था। इसी से टकरा कर उसका चर्म रोग ठीक हो गया जिसके बाद उसने ये मंदिर बनवाने की सोची जिसके बाद ये मन्दिर प्रचलित हो गया और आज भी लोग यहाँ पर झाड़ू चढ़ाने आते हैं।

 

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