
किसी भी देश का सैनिक अपने कर्तव्य के प्रति इतना ईमानदार होता है कि जब तक मौत ना आ जाए तब तक वह पीछे नही हटता. देश के लिए वह अपने घर वार तक को छोड़ देता है और अपनी जिंदगी देश की सुरक्षा में न्योछावर कर देता है. ऐसे कई सैनिको की वीरता और जज्बें की दास्तां हम हमेशा से सुनते आ रहे हैं. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि कोई सैनिक मरकर भी अपने कर्तव्य से पीछे नही हटा. जी हाँ आज हम जिस फौजी की बात कर रहे हैं इस सैनिक का नाम था बाबा हरभजन सिंह. चलिए जानते हैं बाबा हरभजन सिंह के अद्भुत कहानी के बारे में …..
कहा जाता है कि सिक्किम में भारत-चीन सीमा पर मौत के 48 साल बाद भी एक मृत सैनिक तैनात है. जो कि सरहद की रक्षा कर रहा है. यहीं नहीं उस सैनिक की याद में एक मंदिर भी बना हुआ है.. जो कि सिक्किम की राजधानी गंगटोक में जेलेप्ला दर्रे और नाथुला दर्रे के बीच लगभग 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। ये मंदिर शहीद सैनिक बाबा हरभजन सिंह के मंदिर के नाम से जाना जाता है. जिसमे उनकी एक तस्वीर और सामान रखा हुआ है.

बाबा हरभजन सिंह की मृत्यू 4 अक्टूबर 1968 में सिक्किम के नाथुला पास में गहरी खाई में गिरने से हुई थी. जिसके` बाद कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए कि लोगों को ये विश्वास हो गया कि सैनिक हरभजन सिंह की आत्मा मरकर भी यहां सरहदों की रक्षा करती है. बड़ी बात यह है कि चीन के सैनिक भी इस बात पर विश्वास करते हैं और डरते हैं कि यहां सरहद की सीमा पर बाबा मुस्तैद हैं, क्योंकि उन्होंने भी बाबा हरभजन सिंह के मृत्यु के बाद भी उन्हें घोड़े पर सवार होकर बॉर्डर पर गश्त करते हुए देखा है.
उनका जन्म 3 अगस्त 1941 को पंजाब के कपूरथला जिला के ब्रोंदल गांव में हुआ था और साल 1966 में उन्होंने 23वीं पंजाब बटालियन ज्वाइन की थी। उनकी मृत्यु एक हादसा थी.. दरअसल सिक्किम में पोस्टेड हरभजन सिंह 4 अक्टूबर 1968 के दिन टेकुला सरहद से घोड़े पर सवार होकर अपने मुख्यालय डेंगचुकला की तरफ जा रहे थे तभी वो एक तेज बहते हुए झरने में जा गिरे जहां उनकी मौत हो गई।
इस हादसे के बाद पांच दिन तक सर्च ऑपरेशन चला था , लेकिन उनका कुछ भी पता नही चला जिसके बाद उन्हें लापता घोषित कर दिया गया। जानकर बताते हैं कि हादसे के पांचवें दिन हरभजन सिंह ने अपने एक साथी सिपाही प्रीतम सिंह को सपने में आकर अपनी मृत्यु की जानकारी दी और बताया था की उनका शव कहां पड़ा है। साथ ही उन्होंने प्रीतम सिंह से उसी स्थान पर अपनी समाधि बनाए जाने की इच्छा भी रखी। हालांकि लोगों को पहले तो प्रीतम सिंह की बात का विश्वास नहीं हुआ, लेकिन फिर जब उनका शव बताए हुए स्थान पर मिला तो स्थानीय लोगों के साथ सेना के अधिकारियों को भी उनकी बात पर विश्वास हो गया।
ऐसे में इस घटना के बाद सेना के अधिकारियों ने सैनिक हरभजन सिंह की उसी जगह छोक्या छो नामक स्थान पर समाधि बनवा दी। इस मंदिर में बाबा हरभजन सिंह के जूते और उनका सामन रखा हुआ है। बड़ी बात यह है कि इस मंदिर की देखरेख भारतीय सेना के जवान करते हैं और हर रोज बाबा के जूते पॉलिश करना, उनका बिस्तर सही करना, ये सैनिको की ड्यूटी है। मंदिर में तैनात सिपाही भी बताते है कि हर रोज बाबा हरभजन सिंह के जूतों पर मिट्टी और किचड़ लगा हुआ होता है और बिना किसी के छुए भी उनके बिस्तर पर सलवटें दिखाई देती हैं।

इसके साथ ही बाबा हरभजन सिंह के बारे में कहा जाता है कि मरने के बाद भी वो सैनिक के रूप में अपनी ड्यूटी करते हैं और सबसे हैरत वाली बात ये है कि ऐसा बताया जाता है कि शहीद हरभजन सिंह चीन की गतिविधियों की जानकारी अपने साथियों को देते हैं। ऐसे में हरभजन सिंह के प्रति सेना का भी इतना विश्वास है कि बाकी सभी की तरह उन्हें वेतन, दो महीने की छुट्टी जैसी सुविधा भी दी जाती थी। वैसे अब वो फिलहाल रिटायर हो चुके हैं।
इसके पहले जब वे सेवा में थें तब सेना की तरफ से दो महीने की छट्टी के दौरान ट्रेन में उनके घर तक की टिकट बुक करवाई जाती थी और इसके लिए स्थानीय लोग उनका सामान लेकर जुलूस के रूप में उन्हें रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते थे। उस समय उनके वेतन का एक चौथाई हिस्सा उनकी मां को भेजा जाता था।
वहीं आज भी जब नाथुला में भारत और चीन के बीच फ्लैग मीटिंग होती है तो चीन की तरफ से बाबा हरभजन के लिए एक अलग से कुर्सी लगाई जाती है। इस तरह मर कर भी सैनिक हरभजन सिंह अपने कर्तव्य और देशभक्ति के लिए जाने जाते हैं।





