
मित्र नहीं है उत्तराखंड की मित्र पुलिस

देहरादून। मित्र के नाम पर पुलिस किस तरह दुश्मनी निकालती है, इसका प्रमाण युवा अधिवक्ता अमित तोमर दिया गया। अमित तोमर जो पुलिस परिवार से हैं और पुलिस के काफी पक्षधर हैं को देहरादून के एक थाने में जो कुछ सुनना पड़ा वह उन्हीं के मुंह से सुना जाए तो अच्छा रहेगा। उन्होंने बताया कि ‘उत्तराखण्ड पुलिस’ के घिनौने चेहरे से परिचित हुआ। शायद अब कभी दून पुलिस की प्रशंसा ना कर सकूं। श्री तोमर के अनुसार शाम के लगभग 6 बजे थे, दो लड़के मेरा घर ढूंढ़ते हुए किसी प्रकार मुझ से मिले। दोनो ग्राफ़िक एरा यूनिवर्सिटी में एमएससी के छात्र थे। मैं उन्हें नहीं जानता था पर वो शायद मुझे फेसबुक या ट्वीटर पर फॉलो करते होंगे। यह प्रकरण एक 20 साल के लड़के को बिना गिरफ्तारी दिखाए क्लेमेंट टाउन थाने में बंद रखने से जुड़ा है । उनकी बातों में सच लगा तो मैं उनके साथ क्लेमेंट टाउन थाने जा पहुंचा। थाने के रिसेप्शन पर उप निरीक्षक विजय प्रताप सिंह बैठे थे। मैंने उन्हें अपना अधिवक्ता होने का परिचय दिया और जानना चाहा कि किस अपराध में उस 20 साल के बच्चे को गिरफ्तार कर बंधक बनाया गया है और उसे भोजन तो छोड़ो पानी तक नहीं दिया गया। मेरा अपराध बस इतना था कि मेरे मुहँ से संविधान का अनुच्छेद 22 और सीआरपीसी का सेक्शन 57 निकल गया। मैं पूछ बैठा कि किस कारण इस बच्चे को हवालात में बंद किया हुआ है। उप निरीक्षक विजय प्रताप सिंह ने छूटते कहा, “साले तू हमें कानून सिखाएगा, हमारी मर्ज़ी है हम जो चाहे वो करेंगे। तू वकील है तुझसे जो उखड़ता हो उखाड़ ले और ज्यादा बोला तो तुझे भी अंदर कर दूंगा।” ऐसे शब्द मैंने जीवन मे पहली बार सुने थे। थाने आने से पहले थानाध्यक्ष दिलबर नेगी से बात की थी जिन्होंने कहा था कि एक्सीडेंट का मामला है और कोई प्रार्थना पत्र नही मिला कि मुकदमा लिख सके। फिर भी इस बच्चे को पुलिस ने सलाखों के पीछे क्यो सड़ाया? मेरे होश तब उड़ गए कि यही बच्चा कल रात तहरीर लिखाने थाने आया था कि किसी वाहन चालक ने उसकी गाड़ी को टक्कर मार दी, पुलिस ने तहरीर तो लिखी नहीं उल्टा इस बच्चे को बिठा लिया। अन्त में दरोगा को एहसास हुआ कि गलत जगह फंस गए और तुरंत बच्चे को छोड़ दिया।
अब बात कानून की और मानवाधिकार की। कौन से कानून के तहत इस बच्चे को बिना किसी शिकायत के बन्द किया गया? कौनसा कानून है जो खाकीधारी को गुंडई का अधिकार देता है? कौनसा कानून है जो इन्हें आम जनमानस से बदतमीज़ी का अधिकार देता है? यह है उत्तराखंड की मित्र पुलिस का एक और रुप।