देहरादून- देश में बढ़ते नाबालिगों के साथ यौन अपराध के मामलों में भले ही सुप्रीम कोर्ट ने पोक्सो एक्ट लागू कर दुराचारियों में खौफ पैदा करने का प्रयास किया हो, लेकिन उत्तराखण्ड में इस एक्ट के चलते कोई खास सफलता देखने को नहीं मिल पायी है। उत्तराखण्ड में आये दिन नाबालिगों के साथ होने वाले यौन अपराध इसकी बानगी भर है।
देश में नाबालिगों के साथ बढ़ते यौन अपराधों को देखते हुए जहां सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की सुरक्षा हेतू 2012 में पोक्सो एक्ट का गठन किया था वहीं 2016 में इसे संशोधित कर इसमें फांसी की सजा का भी प्रावधान कर दिया था। पोक्सों एक्ट के लागू होने के बाद आम जन को लगने लगा था कि अब शायद नाबालिगों के साथ दुराचार के मामले थमने लगेंगे।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं उल्टे उत्तराखण्ड जैसे राज्य में इन मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी। राजधानी दून की बात करें तो पिछले दिनों यहां कई शिक्षण संस्थानों में नाबालिगों के साथ यौन शोषण के मामले सामने आये है। इसके अतिरिक्त पूरे राज्य में नाबालिगों के साथ दुष्कर्म के कई मामले देखने को मिले है। बीते दिनों सहसपुर क्षेत्र में एक नाबालिग के साथ कुछ लड़कों ने दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। हालांकि दून पोक्सो न्यायालय द्वारा इस वर्ष अब तक 32 मामलों में आरोपियों को सजा सुना दी गयी है। फिर भी सोचनीय सवाल यह है कि क्या सिर्फ कानून बनाने से नाबालिगों के साथ होने वाले इन अपराधों में कमी लायी जा सकती है



