नैनीताल: उत्तराखंड में अपात्र विकलांगता प्रमाण पत्रों के जरिए शिक्षा विभाग में आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी पाने वाले कई कर्मचारियों के प्रमाण पत्रों की जांच की मांग को लेकर हाई कोर्ट ने दायर याचिका पर सुनवाई की। मामले में बीते दिन स्वास्थ्य सचिव की जगह एडिशनल सेक्रेटरी कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। उनके द्वारा कोर्ट को बतया गया कि अपात्र लोगों के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच कराई जा रही है, कोर्ट इससे भी संतुष्ट नहीं हुई। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 मार्च की तारीख निर्धारित की है।
हाईकोर्ट में अपात्र विकलांगता प्रमाण पत्रों की जांच पर सुनवाई
दरअसल, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आज अपात्र विकलांगता प्रमाण पत्रों के जरिये शिक्षा विभाग में आरक्षण का लाभ उठा रहे कार्मिकों के प्रमाण पत्रों की जांच की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 15 मार्च की डेट तय की है। कोर्ट के आदेश पर स्वास्थ्य सचिव की जगह एडिशनल सेक्रेटरी कोर्ट में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से मौजूद हुए। उनके द्वारा कोर्ट को बताया गया कि अपात्र लोगों के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच कराई जा रही है, लेकिन कोर्ट इससे भी संतुष्ट नहीं हुई।
एम्स ऋषिकेश की डॉक्टर कमेटी करेगी जांच
हाई कोर्ट ने एम्स ऋषिकेश के न्यूरोलॉजिस्ट की अध्यक्षता में डॉक्टरों की एक कमेटी बनाने का आदेश दिया है। और कमेटी से कहा है कि वो मामले की जांच करके अपनी जांच रिपोर्ट 15 मार्च से पहले कोर्ट में प्रस्तुत करें। मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 मार्च की डेट तय की गई है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में की गई। इससे पहले कोर्ट ने विभाग से उन सभी व्यक्तियों की सूची मांगी थी, जिन्हें दिव्यांग कोटे के तहत नियुक्ति दी गई है।
विभाग से मांगी गई दिव्यांग कोटे की सूची
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि शपथ पत्र के साथ नियुक्त व्यक्तियों की विकलांगता का प्रकार और उनके विकलांगता प्रमाणपत्रों की प्रतियां अनिवार्य रूप से संलग्न की जाएं। ये आदेश नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड, उत्तराखंड शाखा द्वारा दायर जनहित याचिका के संदर्भ में आया, जिसकी सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई।
जानकारी के अनुसार, नेशनल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड, उत्तराखंड की शाखा ने याचिका में यह आरोप लगाया है कि कुछ ऐसे लोग जो वास्तव में ‘दृष्टिबाधित’ नहीं हैं, आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। इसके कारण वास्तविक दिव्यांग उम्मीदवार अपने अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर शिकायत दर्ज करने के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

