देशभर में छठ का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है। बिहार, झारखंड और यूपी के पूर्वांचल में इस त्योहार का काफी महत्व है, लेकिंन उत्तराखंड़ मे बिहारी समुदाय के लोग अधिक होने के कारण यह यहां पर भी धूमधाम से मनाया जाता है। इसमें छठी माईं एवं सूर्य देवता की पूजा की जाती है। यह पर्व चार दिनों का होता है।
छठ पूजा का व्रत बहुत ही कठिन होता है। इसमें सभी व्रतधारकों को सुख-सुविधाओं को त्यागना होता है। इसके तहत व्रत रखने वाले लोगों को जमीन पर एक कम्बल या चादर बिछाकर सोना होता है। इसमें किसी तरह की सिलाई नहीं होनी चाहिए। ये व्रत ज्यादातर महिलाएं करती है। वर्तमान में अब कुछ पुरुष भी यह व्रत करने लगे हैं ।छठ पूजा का महत्व रामराज्य के समय से ही देखने को मिलता है। एक मान्यता के अनुसार लंका में विजय प्राप्त करने के बाद श्री राम और माता सीता ने छठ पूजा की थी। उन्होंने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को व्रत रखा था। इसमें उन्होंने सूर्य देव की पूजा की थी। दूसरी पौराणिक कथाओं के अनुसार सबसे पहले छठ पूजा सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। उन्हें सूर्य देव के प्रति बहुत आस्था थी। वे हमेशा कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य देव की कृपा के कारण ही उन्हें जगत में बहुत सम्मान मिला।
छठ पूजा व्रत की शुरूआत नहाय-खाय नामक रस्म से होती है। व्रत के पहले दिन इसमें घर की साफ-सफाई करके उसे पवित्र बनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले शुद्ध शाकाहारी खाना बनाकर भोजन करते हैं। इस दिन व्रतधारी कद्दू की सब्जी, दाल-चावल खाते हैं। छठ पूजा व्रत का दूसरा दिन कार्तिक मास की शुक्ल पंचमी को होता है। इसमें पूरे दिन उपवास रखा जाता है। शाम को खाना खाया जाता है। इसे खरना रस्म कहते हैं। इसके तहत अपने पड़ोसियों एवं जान-पहचान के लोगों को प्रसाद ग्रहण करने के लिए बुलाया जाता है।
प्रसाद में गन्ने के रस एवं दूध से बना चावल के खीर, चावल का पीठा और घी लगाई हुइ रोटियां शामिल होती हैं। इस दौरान किसी भी भोजन में नमक एवं चीनी का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया जाता है। छठ पूजा व्रत का तीसरा दिन कार्तिक मास की छष्ठी को पड़ता है। इसमें शाम के समय व्रतधारी किसी नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। सूर्य देव को दूध और जल से अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही एक बांस के टोकरी में मैदे से बना ठेकुआ, चावल के लड्डू, गन्ना, मूली व अन्य सब्जियों और फलों को रखा जाता है, इसे सूप कहते हैं। इस प्रसाद को अर्घ्य के बाद सूर्य देव और छठी माईं को अर्पण किया जाता है।
छठ पूजा व्रत का अंतिम दिन कार्तिक मास की शुक्ल सप्तमी की पड़ता है। इसमें व्रत रखने वाले लोग सूर्योदय से पहले उसी नदी या तालाब में जाकर सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं जहां उन्होंने बीती शाम को दी थी। पूर्व संध्या की तरह प्रात:काल भी वही रस्में की जाती है। इसके बाद व्रतधारक घर के पास पीपल के पेड़ की पूजा करते हैं। पीपल के पेड़ को ब्रम्ह बाबा भी कहते हैं। पूजा के बाद व्रतधारक कच्चे दूध का शरबत एवं थोड़ा प्रसाद ग्रहण कर अपना व्रत पूर्ण करते हैं, इस प्रक्रिया को पारण कहते हैं।