Monday, February 23, 2026
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स्वतंत्रता आंदोलन की निशानियों को जागृत करें : एडवोकेट हरवीर सिंह कुशवाह

देहरादून। उत्तराखंड के आंदोलन के प्रतीक स्मारक बहुचर्चित नहीं हो पा रहे है। इसका कारण इन स्थानों में लोगों की रूचि नहीं होना हो। यह मानना है वरिष्ठ अधिवक्ता समाजवादी नेता हरवीर सिंह कुशवाह का। सर्वोदय से जुड़े श्री कुशवाह का कहना है कि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई स्मारक है, जिनमें आंदोलनकारियों ने अपने आंदोलन की अलख जगाई। इन्हीं में थानों गांव स्थित सौ साल पुरानी पानी की टंकी तथा खाराखेत जैसा स्थान भी है जहां नमक सत्याग्रह चलाया गया, लेकिन आज यह स्मारक तीर्थ स्थल नहीं बन पा रहे हैं, इसके पीछे लोगों की अज्ञानता तथा शासन प्रशासन की भी नीरसता भी है जिसके कारण इन स्थानों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा है।

श्री कुशवाह ने बताया कि कुछ ऐसे ही गुमनाम आंदोलनकारियों के संघर्ष की गवाह है देहरादून जिले के थानो गांव में स्थित सौ साल पुरानी पानी की टंकी। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन से प्रभावित होकर इसी टंकी के पास क्षेत्र के सैकड़ों लोग अनशन पर बैठ गए थे। उन पर अंग्रेजों की लाठियों का भी कोई असर नहीं हुआ था। आज यह टंकी भले ही जीर्ण-शीर्ण हालत में हो, लेकिन क्षेत्र के युवाओं में आज भी जोश भरने का काम करती है। थानो न्याय पंचायत की ग्राम पंचायत कंडोगल स्थित कन्या कर्मोत्तर विद्यालय परिसर में खड़ी पानी की यह टंकी आज भी स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षों की कहानी बयां कर रही है। वर्ष 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान देशभर में संघर्ष की ज्वाला भड़क चुकी थी, जिसकी चिंगारी से थानो भी अछूता नहीं रहा। तब देशभर में चल रहे आंदोलन से प्रेरित होकर क्षेत्र के लोगों ने भी संघर्ष की ठानी और कई गांवों के लोग इसी पानी की टंकी के पास एकत्र होकर आंदोलन की रणनीति बनाने लगे।
वर्ष 1945 के दौरान क्षेत्र के युवा पद्म ङ्क्षसह सोलंकी, वैद्य सेनपाल ङ्क्षसह भिडोला, गौरीश वर्मा, बुद्धदेव, शेरा के पंचम सिंह कृषाली, बमेत के पद्म सिंह रावत, बड़ासी के हरि सिंह गोदी, भूरिया सिंह व विशन सिंह और घंडोल के सूरत सिंह चौहान के नेतृत्व में सैकड़ों आंदोलनकारी इसी पानी की टंकी के पास अनशन पर बैठ गए। अंग्रेजों ने जब यह देखा तो ग्रामीणों पर लाठीचार्ज कर उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। इस घटना के करीब दो साल बाद 15 अगस्त 1947 को आजाद भारत की सुबह हुई। लेकिन, देशभर के अनगिनत आजादी के दीवानों की तरह थानो के स्वतंत्रता सेनानी भी गुमनामी के अंधेरे में डूब गए। हालांकि, क्षेत्र के लोगों का मानना है कि उन तमाम लोगों का संघर्ष इस पानी की टंकी के रूप में जिंदा है।
ठीक यही स्थिति खाराखेत की भी है जहां नमक सत्याग्रह हुआ था। हालांकि 1983 में तत्कालीन मंत्री पंडित ब्रह्मदत्त एक स्मारक बनवाया था, लेकिन यह स्थान झाड़ झंकाड़युक्त तथा वीरान था। सर्वोदय मंडल के लोगों के प्रयासों से यहां पानी पहुंचा, पुल बना है और अब सड़क पहुंच रही है। इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, हीरा सिंह बिष्ट तथा अन्य कई लोगों से संपर्क किया गया था। गत नौ अगस्त को सर्वोदय मंडल के लोगों ने यहां 80 पेड़ लगाए है, जिनमें आम, नींबू जैसे फलदार वृक्ष भी शामिल है। इस अवसर पर जो प्रमुख लोग उपस्थित थे उनमें बीजू नेगी, कुसुम रावत, अशोक नारंग, हरवीर सिंह कुशवाह, कल्याण सिंह रावत, राजेश पैन्यूली जैसे नाम शामिल थे।
एडवोकेट हरवीर सिंह कुशवाह का कहना है कि स्वतंत्रता आंदोलन की यह निशानियां अक्षुण रहे, इसके लिए स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हम सबको शपथ लेनी चाहिए।

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