Monday, February 23, 2026
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भगवती दुर्गा का सप्तश्लोकी पाठ आपको रंक से राजा बना सकता है! भाग्य जगाने का जगाने का सबसे बड़ा माध्यम है सप्तश्लोकी पाठ

दुर्गा सप्तश्लोकी लोक कल्याण की सबसे बड़ी पुस्तक है, जिसमें मां दुर्गा के महात्म्य का वर्णन किया गया है। यह पुस्तक सभी प्रकार के पापों का नाश कर सभी प्रकार की समृद्धियां प्रदान करती है। श्री दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ माँ दुर्गा की प्रार्थना या माता दुर्गा का स्तोत्र है जिसे हिंदू धार्मिक पाठ, देवी महात्म्य का हिस्सा माना गया है। इसमें सप्तशती अर्थात दुर्गा माँ के सभी रूपों – श्री महाकाली, श्री महालक्ष्मी, श्री महासरस्वती माता का संपूर्ण सार समाहित होता है। दुर्गा सप्तश्लोकी के सात सौ श्लोकों में दुर्गा मां के सभी रूपों का पाठ, नवरात्रि दुर्गा पूजा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ सात अलग-अलग अवतारों में 7 राक्षसों पर मां दुर्गा की विजय का वर्णन करता है।

श्री दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ

श्री दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ माँ दुर्गा की प्रार्थना या माता दुर्गा का स्तोत्र है जिसे हिंदू धार्मिक पाठ, देवी महात्म्य का हिस्सा माना गया है। इसमें सप्तशती अर्थात दुर्गा माँ के सभी रूपों – श्री महाकाली, श्री महालक्ष्मी, श्री महासरस्वती माता का संपूर्ण सार समाहित होता है। दुर्गा सप्तश्लोकी के सात सौ श्लोकों में दुर्गा मां के सभी रूपों का पाठ, नवरात्रि दुर्गा पूजा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ सात अलग-अलग अवतारों में 7 राक्षसों पर मां दुर्गा की विजय का वर्णन करता है।

700 श्लोक वाली दुर्गा सप्तशती के 3 भाग है जिनमें माँ दुर्गा के तीनो रूपों – महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का चित्रण किया गया है। प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में – काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुमुखी, भुवनेश्वरी, बाला, कुब्जा का वर्णन है। द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरुन्धती, सरस्वती का वर्णन है। तृतीय चरित्र में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही तथा चामुंडा (शिवा) का वर्णन है। इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग का सप्तश्लोकी के तीन चरित्रों में वर्णन है। नन्दा, शाकम्भरी, भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा, रक्तदन्तिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है। तंत्र में शक्ति के तीन रूप प्रतिमा, यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं। शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है।

दुर्गा सप्तशती पाठ विधि

सर्वप्रथम- देवी भगवती को प्रतिष्ठापित करें। देवी भगवती को प्रतिष्ठापित करने के लिए कलश स्थापना करें, फिर दीप प्रज्जवलन करें। दीप प्रज्जवलन के लिए या तो आप अखंड ज्योति को जला सकते है या देसी घी का दिया भी जलाया जा सकता है। दीप जलाने के बाद सर्वप्रथम अपने गुरु का ध्यान कीजिए। उसके बाद गणपति, शंकर जी, भगवान विष्णु, हनुमान जी और नवग्रह का ध्यान करें।

श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ का आरम्भ देवी भगवती के ध्यान से आरम्भ होता है। हाथ में जौ, चावल और दक्षिणा रखकर देवी भगवती का ध्यान करिए और उसके बाद देवी भगवती के समक्ष संकल्प लीजिए
“हे भगवती मैं (अपना नाम लीजिये ) सपरिवार (अपने परिवार के नाम लीजिए), गोत्र (गोत्र का नाम लीजिये),स्थान (जहां आप रह रहे हैं) ऐसा बोलते हुए पूरी निष्ठा, समर्पण और भक्ति के साथ देवी भगवती का ध्यान कर रहा हूं। हे भगवती, आप हमारे घर में आगमन करिए और हमारी इस मनोकामना (अपनी इच्छित मनोकामना बोलें, ध्यान रहे आप अपनी मनोकामना मन ही मन बोले) को पूरा करिए।

श्री दुर्गा सप्तश्लोकी पाठ

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य
नारायण ऋषि: । अनुष्टुपादीनि छन्दांसि ।
श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवता: ।
श्री जगदम्बाप्रीत्यर्थ पाठे विनियोग: ॥
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥१॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्रयदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द चित्ता ॥२॥
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये र्त्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥३॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥४॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते ॥५॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥६॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम् ।।7।।

 

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