उपराष्ट्रपति ने वनाधिकारियों को किया सम्मानित

देहरादून। उपराष्ट्रपति का उत्तराखंड दौरा काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उप राष्ट्रपति श्रीएम वेंकैया नायडू उत्तराखंड के दो दिवसीय प्रवास के दौरान ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को सम्मानित किया। महामहिम के दौरे को लेकर सुरक्षा बल पूरी तरह सतर्क है और सड़कों पर पुलिस बल गश्त करता दिखा। हर चौराहे तथा चौक पर पुलिस बल की भारी उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि अतिविशिष्ठ अतिथि के दौरे में पुलिस विभाग कोई कोताही नहीं छोड़ना चाहता।

कार्यक्रम के अनुसार महामहिम उपराष्ट्रपति प्रातकाल करीब आठ बजे जौलीग्रांट एयरपोर्ट पहुंचें जहां उनका स्वागत राज्यपाल डॉ. केके पॉल, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने पुष्प गुच्छ भेंट कर किया। राजभवन में पहुंचकर उउपराष्ट्रपति महोदय ने तेज पत्ता का पौध रोपा। राजभवन के बाद सड़क मार्ग से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी के दीक्षांत समारोह में भाग लेने पहुंचे। उपराष्ट्रपति ने भारतीय वन सेवा के अधिकारियों को सम्मान पत्र वितरित किया। इस पाठ्यक्रम 2016-18 में 53 अधिकारी पासआउट हुए। इन अधिकारियों में 51 और मित्र देश 02 भूटान के दो अधिकारी शामिल थे। इस प्रशिक्षण में 18 अधिकारियों ने श्रेष्ठ अंक प्राप्त कर सम्मान जीता।
दीक्षांत समारोह में उत्तराखंड के राज्यपाल डा. केके पॉल ने चिपको आंदोलन की चर्चा करते हुए कहा कि वर्षों पूर्व चिपको के माध्यम से वनो के संरक्षण की मुहिम छेड़ी गई थी, चिपको आंदोलन आज पूरे विश्व में चर्चित आंदोलन है। उत्तराखंड वनाच्छादित प्रदेशों में शामिल है और वन संरक्षण को लेकर हिमलायी राज्य लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज प्रशिक्षण पूर्ण कर क्षेत्र में जाने वाले इन अधिकारियों की जिम्मेदारी बढ़ी है। इन सभी अधिकारियों को वन संरक्षण की दिशा में आम जनता के साथ मिलकर विशेष प्रयास करना होगा।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने वनों के महत्व और व्यवस्था पर चर्चा की तथा कहा कि हमें वन रोपण के साथ-साथ उनके बचाव पर विशेष कार्य करने की आवश्यकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वनो की सुरक्षा के लिए उत्तराखंडवासियों ने अपने प्राणो की बाजी लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमलायी राज्यों पर वनो के संरक्षण के लिए ईको सेंसिटिव जोन का भी फायदा उठाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि जंगल में लगने वाली आग उत्तराखंड में किसी बड़ी आपदा से कम नहीं है। वैज्ञानिकों को वनो के संरक्षण को लेकर नई तकनीकी विकसित करनी होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here