बेरोजगार पिटते रहे, माननीय अपना वेतन बढ़वाते रहे ! खबर अच्छी लगे तो लाइक और शेयर अवश्य करें

 

वाह री नेतागिरी, भावी भविष्य की भी चिंता नहीं

देहरादून। विज़न 2020 विशेष।

कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिए
कहां चराग मयस्यर नहीं शहर के लिए
दुष्यंत कुमार की यह पंक्तियां सरकार पर भी पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। जहां सेवायोजन कार्यालयों में पंजीकृत हजारों हजार बेरोजगार सड़कों पर धक्के खा रहे है और धरना प्रदर्शन करने पर उन पर पुलिस की लाठियां पड़ रही है। वहीं प्रदेश के माननीय वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपने वेतन भत्तों में 120 गुना बढ़ोतरी कर रहे हैं। यह दुर्भाग्य उत्तराखंड के युवाओं का है। इस बढ़ोतरी में सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष का भी पूरा-पूरा सहयोग है, जिनके सदस्यों ने हर मुद्दे पर सरकार को घेरने के बजाय इस मुद्दे पर सरकार के सुर में सुर मिलाया जिसके कारण यह व्यवस्था पारित हो गई।


एक ओर देहरादून अस्थाई राजधानी में बेरोजगार सड़कों पर धरना प्रदर्शन कर रहे थे। परेड ग्राउंड से रोजगार की मांग को लेकर सचिवालय कूच कर रहे थे। इन बेरोजगारों पर पुलिस ने जी-भर कर लाठियां भांजी। लगभग 20 बेरोजगार घायल हो गए, जिनमें 15 बेरोजगारों को गंभीर चोटें आयी। पुलिस और बेरोजगारों की नोकझोंक भी हुई है। जिन लोगों को अधिक चोटें आयी है उनमें गंभीर रावत, पिंकी रावत, सचिन, चंडीप्रसाद, हेमचन्द्र, जगदीश आदि के नाम शामिल है, शेष को हल्की-फुल्की चोटें आयी।


एक ओर सोमवार 26 मार्च को बेरोजगार लाठियां खा रहे थे वहीं दूसरी ओर विधानसभा सत्र गैरसैंण में माननीयों का वेतन भत्ता 120 गुना बढ़ रहा था। खूबी तो यह है कि बात-बात पर सरकार को घेरने वाले विपक्ष के वह ग्यारह जवान इस मामले में पूरी तरह सरकार के समर्थन में दिखे जो इस बात का संकेत है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को आम जनता से कोई लेना-देना नहीं। सदन में पेश उत्तराखंड राज्य विधानसभा विविध संशोधन विधेयक 2018 को पारित कराने में सत्ता पक्ष और विपक्ष में गजब एकजुटता दिखी। इस विधेयक पर न चर्चा हुई और नही बहस, जिसके कारण यह विधेयक पारित हो गया। लोकायुक्त पर हंगामा कर सदन का समय बर्बाद करने वाले इन कांग्रेस नेताओं को प्रदेश के युवाओं से कुछ लेनादेना नहीं। इतना ही नहीं सबसे लंबे राजनीतिक जीवन का अनुभव रखने वाली डॉ. इंदिरा हृदयेश भी बेरोजगारों के मसले पर चुप रही और अपना वेतन भत्ता बढ़ाने में मौन स्वीकृति दी।
मीडिया रिपोर्ट बताती है कि बेरोजगारों की पिटाई पर मौन चुप्पी तथा वेतन भत्तों पर मूक सहमति इस बात का संकेत है कि कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य पार्टियां उन्हें अपने फायदे के अलावा आम जनता की कोई चिंता नहीं है।

इन दोनों घटनाक्रमों से युवाओं में भारी नाराजगी है। बेरोजगार युवाओं का कहना है कि जनता के प्रतिनिधि बनने का दावा करने वाले इन विधायकों को भावी भविष्य की चिंता नहीं है जबकि अपने वेतन भत्ते के लिए लगातार सहमति दे रहे हैं। युवा सड़कों पर महज दस-बीस हजार के लिए धक्के और लाठियां खा रहा है वहीं माननीय वातानुकूलित कमरों में बैठकर लाखों रुपये बढ़वा रहे हैं और जनता की उपेक्षा हो रही है।

 

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