शैली देहरादून- भारतीय सेना ने
26 जुलाई, 1999 को कश्मीर के कारगिल जिले में पाकिस्तानी घुसपैठियों द्वारा कब्जा की गई ऊंची रक्षा चौकिया पर नियंत्रण पाने में सफलता हासिल की थी। इसके लिए भारतीय सेना ने ऑपरेशन ’विजय’ चलाया था। भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध मई 1999 में शुरू होकर दो महीने तक चला थ। जिसमें भारत ने अपने 500 से ज्यादा जांबाज सैनिक खो दिए थे। ऑपरेशन विजय की सफलता के बाद इस दिन को “विजय दिवस” का नाम दिया गया। विश्व के इतिहास में कारगिल युद्ध दुनिया के सबसे ऊंचे क्षेत्रों में लड़ी गई जंग की घटनाओं में शामिल है। यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने काए जो हंसते-हंसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन उन महान और वीर सैनिकों को समर्पित है जिन्होंने अपना आज हमारे आने वाले सुखद कल के लिए बलिदान कर दिया।
स्वतंत्रता का अपना ही मूल् होता है, जो वीरों के रक्त से चुकाया जाता है। कारगिल युद्ध में हमारे लगभग 500 से ज्यादा वीर योद्धा शहीद हुए थे और 1300 से ज्यादा घायल हो गए थे। इनमें से ज्यादातर वह नौजवान थे जिन्होंने अपनी जवानी के 30 वर्ष भी नहीं देखे थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। एक बार फिर 26 जुलाई के दिन हम सभी ‘कारगिल युद्ध’ में शहीद लोगों को याद करेंगे, लेकिन शायद यह मात्र खानापूर्ति से ज्यादा ना हो। आज भी कई शहीदों के परिवार वाले सरकारी सहायता को दर-दर भटक रहे हैं। धीमी गति से चलती सरकारी योजनाओं का लाभ अकसर इन शहीदों को बहुत देर बाद नसीब होता है। शायद यही वजह है कि आज युवाओं का एक बड़ा वर्ग सैनिक के रूप में अपना जीवन देखना पसंद नहीं करता। देश की सरकार और आवाम को इस तरफ ध्यान देना चाहिए, ताकि देश के युवाओं में देशप्रेम की भावना हमेशा जलती रहे और इस देश कों और अधिक वीर मिलें।




