उत्तराखंड की राजधानी देहरादून खूबसूरत हसीन वादियों के लिए देश ही नहीं विदेशो में भी मशहूर है। दून घाटी के नाम से मशहूर इसकी खूबसूरती को निहारने देशी-विदेशी पर्यटक यंहा आते है। लेकिन क्या पता है कि देहरादून समेत कई जिलों में पैदा होने वाली चाय की विदेशो में भारी डिमांड है। आपको यह बात सुनकर हैरानी होगी कि उत्तराखंड की चाय की विदेशो में इतनी डिमांड है कि यंहा के स्थानीय लोगो अपने शहर में पैदावार हुई चाय का लुफ्त नहीं उठा पाते। लेकिन कई सालो बाद अब स्थानीय लोग अपनी जमीन पर उगी हुई चाय का मजा ले सकेंगे।
दरअसल उच्च दर्जे की यह चाय अब तक विदेशों में सप्लाई होती थी। लेकिन अब राज्य सरकार इसे उत्तराखंड में बेचने की तैयारी कर रही है। इसके लिए डिस्ट्रीब्यूटर की तलाश शुरू कर दी गयी है। पहले स्वतंत्रता संग्राम के पहले उत्तराखंड की हसीन वादियों में रहने के लिए बड़ी संख्या में अंग्रेज आये। उन्हें यहाँ का मौसम इतना पसंद आया कि उन्होंने देहरादून, अल्मोड़ा, कसौनी और भीमताल में चाय की खेती करवानी शुरू कर दी। लेकिन 11 साल बाद 1947 में देश की आजादी के समय इन जगहों पर चाय की खेती बंद हो गयी।लगभग 47 साल बाद उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने 1994 में एक बार फिर इन जगहों पर चाय की खेती शुरू करवाई। यहाँ तैयार की जाने वाली चाय को अमेरिका, जापान, ब्रिटेन समेत कई यूरोपिए देशों में भेजा जाने लगा। कौसानी-टी नाम से प्रसिद्ध इस चाय का स्वाद विदेशियों को इतना पसंद आया कि ऊँचे दामों पर खरीदने लगे।
माँग बढ़ने और अधिक कीमत मिलने की वजह से सरकार ने चाय की खेती को अपने हाथों में ले लिया और साथ ही नैनीताल के घोड़ाखाल, चम्पावत और चमोली के नौटी में जैविक चाय की पत्तियों को प्रोसेस करने के लिए फैक्टियों की स्थापना की गई। लेकिन चाय को अपने ही प्रदेश में नहीं बेचा गया। आखिरकार इस चाय को अपने प्रदेश में बेचने को लेकर चर्चा शुरू हुई और मई 2017 में उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड की देहरादून में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब इस चाय को उत्तराखंड में भी बेचा जायेगा। इसकी कीमत को देखते हुए इसे अब तक प्रदेश के बाजार से दूर रखा गया था।



