
क्या आप अविवाहित है। विवाह कर अपने को सबसे श्रेष्ठ दंपति बनाना चाहते हैं तो आपको गढ़वाल आना होगा। देवों के देव महादेव ने जहां अपना विवाह किया था, ऐसे त्रियुगी नारायण मंदिर में विवाह कर जीवन धन्य कर सकते हैं। रुद्रप्रयाग के त्रियुगी नारायण मंदिर में मां पार्वती और भगवान शिव का परिणय संस्कार हुआ था। भगवान विष्णु के इस मंदिर की पूजा त्रियुगी नारायण के रूप में होती है जहां हुआ विवाह आजीवन प्रेम का प्रतीक बन जाता है।
त्रियुगी नारायण मंदिर में मौजुद अग्निकुंड ही भगवान शिव के विवाह का साक्षी है। त्रेता युग से जल रही यह अखंड ज्योत आज भी लगातार प्रज्जवलित हो रही है। पौराणिक कथाओं की माने तो त्रियुगी गांव से 5 किमी दूर जिस स्थान में बैठकर मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तप किया उस स्थान के नाम को आज गौरी कुंड के नाम से जाना जाता है। जो श्रद्धालु त्रियुगी नारायण मंदिर घूमने आते हैं वह गौरीकुंड अवश्य जाते हैं।

उत्तराखंड के रूद्रप्रयाग में केदारनाथ के समीप स्थित है त्रियुगी नारायण मंदिर हिंदू पौराणिक ग्रंथो के अनुसार भगवान शिव ने पर्वतराज हिमावत की पुत्री पार्वती से मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगी नारायण गांव में जलने वाली अग्नि ज्वाला के सामने शादी की थी। मंदिर के अंदर जलने वाली अग्नि त्रेता युग से जलती आ रही है इसलिए इस स्थल का नाम त्रियुगी हो गया। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने केदारनाथ के मार्ग में पड़ने वाले गुप्त काशी में विवाह का प्रस्ताव रखा था और त्रियुगी नारायण में शादी हुई। तब से अब तक यहां कई जोड़े विवाह बंधन में बंधते हैं। यहां के लोगो का मानना है कि इस स्थल में शादी करने से दाम्पत्य जिवन सुख से गुजरता है। शिव और पार्वती के इस विवाह में पार्वती के भाई के रूप में भगवान विष्णु ने सभी रस्में निभाई और ब्रह्मा पुरोहित बनें थे।



