
देहरादून । पावर ट्रांसमिशन कार्पोरेशन आफ उत्तराखंड यानि पिटकुल अधिकारियों का फुटबाल बना हुआ है। जो भी अधिकारी आता है वह एक ठोकर लगा कर चल देता है। जितनी जल्दी-जल्दी अधिकारियों का प्रभार बदला जा रहा है, उतना ही काम में बाधाएं आ रही है। एक बार फिर पिटकुल के प्रबंध निदेशक का प्रभार रणवीर सिंह चौहान से लेकर कैप्टन आलोक शेखर तिवारी को दे दिया गया है जबकि भूपेश तिवारी को अपर सचिव ऊर्जा के साथ-साथ अपर सचिव वित्त एवं निदेशक ऊर्जा की जिम्मेदारी दी गई है। भूपेश से उरेडा की जिम्मेदारी भी वापस ले ली गई है।
ताश के पत्तों की तरह अधिकरियों को फेंटने की परंपरा के कारण पिटकुल उन्नति नहीं कर पा रहा है। दूसरी ओर ईमानदार और कर्मठ रणवीर सिंह चौहान से जब से अपर सचिव ऊर्जा का कार्यभार हटाया गया था तभी से यह लगने लगा था कि उनसे पिटकुल का एमडी का प्रभार भी ले लिया जाएगा।
आंकड़े बताते हैं कि पिटकुल जैसे महत्वपूर्ण विभाग को सरकार ने संजीदगी से नहीं लिया। 2016 में एसएस यादव पिटकुल के एमडी बने। उन्हें इस पद से हटाकर यूजेवीएनएल के एमडी एसएन वर्मा को यह जिम्मेदारी दी गई। बाद में श्री वर्मा से भी यह प्रभार वापस लेकर यूपीसीएल के निदेशक ऑपरेशन अतुल अग्रवाल को सौंपा गया। अतुल अग्रवाल ने कुछ बाद दिन स्वत: ही अपना प्रभार छोड़ दिया। उनके बाद रणवीर सिंह चौहान को यह जिम्मेदारी दी गई। अब आलोक शेखर तिवारी को यह जिम्मेदारी दी गई है। यह इस बात का संकेत है कि पिटकुल के प्रबंध निदेशकों को न तो काम समझने का मौका दिया जाता है और न ही उनके कार्यों को देखा जाता है। पिटकुल एक लंबे अर्से से अधिकारियों का फुटबाल बना रहा। वैसे भी उत्तराखंड ऊर्जा निगम का यह महत्वपूर्ण विभाग अधिकारियों के बार-बार बदलने से अपने कामों को सही मायने में अंजाम नहीं दे पा रहा है। इसके पीछे कारण क्या है यह तो बदलने वाले अधिकारी बता सकेंगे लेकिन बार-बार अधिकारियों के बदलने से उनकी प्रतिभा का आंकलन नहीं किया जा सकता।




