रूद्रप्रयाग; दम तोडने के कगार पर पहाड़ की स्वास्थ्य सेवा की रीड़ 108 आपतालीन सेवा
रूद्रप्रयाग में सात के सापेक्ष चार वाहन फांक रहे धूल, तीन की हालत बदतर, कर्मचारियों को तीन माह से वेतन नहीं
सरकार के मुंह पर सीएमओ का बड़ा तमाचा कहा 108 के बारे में राज्य सरकार को सोचना चाहिए
पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाओं की रीड़ 108 सेवा अब दम तोडने के कगार पर है, ये मानें कि यदि राज्य सरकार समय रहते चेती नहीं तो इस सेवा का सिमटना तय। जनपद रूद्रप्रयाग की बात करें तो यहां 108 सेवा के हाल इतने बूरे हैं कि स्वास्थ्य महकमे की मुखिया भी खुद इन व्यवस्थाओं का रोना रो रही हैं। स्वास्थ्य विभाग की सबसे जिम्मेदार अधिकारी ही सरकार की इन व्यवस्थाओं को नाकाफी बताती हैं ।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवायें कब पटरी पर लौटेंगी फिलहाल इसकी उम्मीद करना तो बेकार ही है, क्योंकि अच्छा और जानकार डाॅक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं है और जो संसाघन मौजूद है उनके भरोसे बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद करना ही बेकार है। वर्ष 2008 में तत्कालीन भाजपा सरकार के स्वास्थ्य मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने 108 आपातकालीन सेवा की नींव रखी थी। कुछ सालों तक तो 108 सेवा अपने मकसद में कारगर साबित हुई, लेकिन समय के साथ-साथ इस सेवा के प्रति सरकार की बढती लापरवाही ने आज 108 को इस हाल पर खड़ा कर दिया है कि रूद्रप्रयाग जिले में सात 108 वाहनों में से चार धूल फांक रहे है और जो तीन चल भी रहे हैं वह खुद ही आपात स्थिति में हैं।
समय से मेंटिनेन्स न होन के चलते यह वाहन सड़क पर चलते-चलते कब जाम हो जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। वहीं 108 सेवा पर कार्यरत कर्मचारियों को भी तीन माह से कोई पगार नहीं है। जैसे वाहन की हालत वैसे ही कर्मचारियों की भी।

सीएमओ डाॅ0 सरोज नैथानी साफ कहती हैं कि पहले तो रूद्रप्रयाग जैसे आपदाग्रस्त और विकट भौगोलिक परिस्थतियों वाले जिले में सात 108 वाहन ही नाकाफी है, लेकिन इसके बावजूद भी चार खराब पड़ी होना दुर्भाग्य है। उन्होंने राज्य सरकार पर दोष मढ़ते हुए कहा कि यह राज्य सरकार का मामला है जिले का नहीं। 108 वाहनों की जो हालत है वह चिंताजनक है और यही वजह है कि अक्सर लोग उपचार या किस ईमरजेंसी में अपने प्राइवेट वाहनों से हास्पिटल आते है।
वहीं स्थानीय जनता और जनप्रतिनिधियों की मानें तो सरकार की बड़ी लापरवाह इसकी वजह है। जिस तरह 108 वाहनों की हालत है, उनमें मरीजों को ले जाने में डर लगता है। उनका कहना है कि सरकार 108 सेवा की यही स्थिति रही तो कभी भी यह सेवा ठप पड़ सकती है। उनका यह भी कहना है कि खुद स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इस बात को मान रहे हैं कि 108 सेवा बदतर हालत में है, तो फिर सरकार क्यों लापरवाह बनी है।
इन हालतों को देखकर अब यह कहना गलत नहीं होगा कि 108 सेवा की बदहाली के पीछे राज्य सरकार के खोखले दावे और लापरवाह कार्यप्रणाली साफ तोर से जिम्मेदार है और जब खुद उनके ही अधिकारी इस बात की हकीकत को बयां कर रहे हैं, तो इससे बडा दुर्भाग्य सरकर के लिए और कुछ नहीं हो सकता।


