Sunday, March 1, 2026
Home राज्य उत्तराखण्ड दून ने लिखी एक जन आंदोलन की इबारत….

दून ने लिखी एक जन आंदोलन की इबारत….

अजित सिंह राठी की कलम से

प्रकृति के हरे भरे ताशीर को निगल रही प्लास्टिक के विरोध में ऐसा कार्यकम दून घाटी में पहले न देखा न सुना, आज सुबह यह कार्यक्रम जब अदभुत तरीके से एक विशाल रूप धारण कर गया तब लोगों और आलोचकों की समझ में आया कि यह ख़ालिश कार्यक्रम ही नहीं है, जीवन बचाने के लिए एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत है। ऐसा लग रहा था कि यह नगर निगम देहरादून का नहीं किसी बड़े किसी बड़े सियासी दल का कार्यक्रम है। वैसे भी इस कार्यक्रम को मील का पत्थर बनाने में नगर निगम के राजनीतिक तंत्र ने भी दलीय भावना से ऊपर उठकर काम किया। एक शहर, पचास किलोमीटर लम्बी मानव श्रंखला, सवा लाख से भी ज्यादा लोग, व्यवस्थित कार्यक्रम और लेशमात्र भी कोई ऐसी बात नहीं जिससे कार्यक्रम का स्वरूप बिगड़ता हो। दाद देनी पड़ेगी नगर आयुक्त व आईएएस विनय शंकर पांडेय की जिन्होंने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और मेयर सुनील उनियाल गामा को भरोसे में लेकर एक इतनी लम्बी लकीर खींच दी कि भविष्य में इस तरह का कार्यक्रम करवाने से पहले एक नहीं सौ बार सोचना पड़ेगा। चूँकि अमूमन इस तरह का कार्यक्रम कोई बड़ा राजनीतिक दल ही कर सकता है सरकारी हाकिम नहीं। ऐसा मैकेनिज़्म तैयार किया कि महानगर के एक छोर से दूसरे छोर तक स्कूली बच्चे, बूढ़े, जवान, अधेड़, महिला पुरुष, युवा, सरकारी कर्मचारी, तमाम आईएएस आईपीएस व अन्य बड़े अफसर, जन प्रतिनिधि, राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्त्ता सड़क पर उतरकर मानव श्रंखला में न केवल शामिल हुए बल्कि बुलंद आवाज में कह उठे “अब प्लास्टिक नहीं” इतनी लम्बी लकीर ऐसे ही नहीं खिंच गयी, इसके पीछे महीनों की मेहनत, एक ठोस कार्ययोजना और उसके सतत प्रभावी अनुश्रवण के लिए बहाया गया पसीना है जिसने इस फसल को लम्बे समय तक सींचा था। कार्यक्रम की सफलता, सड़कों पर उत्तरी भीड़ का जज्बा आज मुख्यमंत्री के चेहरे पर तैरती मुस्कान के भाव को और गहरा कर दे रहा था। और मुस्कान की यह गहराई काफ़िला बढ़ने के साथ ही बढ़ती जाती थी। गामा से पहले रहे मेयर भी सोच रहे होंगे कि इस सामाजिक चेतना को जगाने का प्रयास उन्होंने क्यों नहीं किया, नगरायुक्त की कुर्सी को पनिशमेंट मानने वाले नौकरशाह भी सदमे में होंगे।

इस जन चेतना आंदोलन की पृष्ठभूमि
27 अगस्त को मेयर और नगरायुक्त प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने के लिए शहर से जुड़े तमाम संगठनों की बैठक बुलाकर इसका उदघोष किया। 11 से 20 सितम्बर तक सभी पार्षद अपनी टीम के साथ अपने वार्डों में गए और स्वैच्छिक पॉलीथिन दान कार्यक्रम चलाकर 83 क्विंटल प्लास्टिक लोगों के घरों से एकत्र किया। शहर के स्कूलों में 15 से 30 सितम्बर तक प्लास्टिक बैंक बनाकर बच्चों को अपने अपने घरो से प्लास्टिक मंगवाई और 63 क्विंटल प्लास्टिक एकत्र की। 02 अक्टूबर से शहर में कपड़े के बैग का वितरण शुरू किया गया और 40 हजार घरो में इसका वितरण हुआ। असर यह हुआ कि महानगर के कचरा निस्तारण के लिए लगे ठोस अपशिष्ट निस्तारण प्लांट के पर्यावरणीय वैज्ञानिक ने इस बात की रिपोर्ट निगम को दी है कि पिछले अगस्त से अब तक प्लास्टिक के कचरे में 65 फ़ीसदी की कमी आई है।

चुनौती भी है

निसंदेह कार्यक्रम लाजवाब हुआ। लेकिन यदि इस कार्यक्रम की सफलता की खुमारी जल्दी ही नहीं उत्तरी और नगर निगम अपने लक्ष्य को पूरा करने में नहीं जुटा तो समझ लीजिये सड़क पर निगम को मिला यह जनादेश व्यर्थ जायेगा। कार्यक्रम के कामयाब होने की आतिशबाजी के बजाय अपनी ऊर्जा को गंतव्य के कोस नापने में लगाना होगा। अनुश्रवण का तारतम्य टूटा तो जनता जनार्दन जवाब मांगेगी।

 

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