उसने छीन लिया जिंदगी का सुकून…!!!

इंटरनेट काम की चीज तो है लेकिन इसी इंटरनेट ने लोगों का जीना हराम कर दिया है। न रात को चैन न दिन में आराम। पूरी तरह बिखरी-बिखरी जिंदगी लेकर अपना समय बिता रहे हैं, इसका कारण किसी पर एक भी मिनट का समय न होना है।
जी हां, हम सबका यही हाल है आजकल, न वक़्त है, न ही फ़ुर्सत….. क्योंकि ज़िंदगी ने जो रफ्तार पकड़ ली है, उसे धीमा करना अब मुमकिन नहीं। इस रफ्तार के बीच जो कभी-कभार कुछ पल मिलते थे, वो भी छिन चुके हैं, क्योंकि हमारे हाथों में, हमारे कमरे में और हमारे खाने के टेबल पर भी एक चीज हमारे साथ हमेशा रहती है। इंटरनेट किसी वरदान से कम नहीं। आजकल तो हमारे सारे काम इसी के भरोसे चलते हैं, जहां यह रुका, वहां लगता है मानो सांसें ही रुक गईं। कभी ज़रूरी मेल भेजना होता है, तो कभी किसी सोशल साइट पर कोई स्टेटस या पिक्चर अपडेट करनी होती है। ऐसे में इंटरनेट ही तो ज़रिया है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचाता है, लेकिन आज यही इंटरनेट हमारे निजी पलों को हमसे छीन रहा है।
किस तरह छिन रहे हैं फुर्सत के पल?
चाहे ऑफिस हो या स्कूल-कॉलेज, पहले अपनी शिफ्ट खत्म होने के बाद का जो भी समय हुआ करता था, वो अपनों के बीच, अपनों के साथ बीतता था। आज का दिन कैसा रहा, किसने क्या कहा, किससे क्या बहस हुई, जैसी तमाम बातें हम घर पर शेयर करते थे, जिससे हमारा स्ट्रेस रिलीज हो जाता था। लेकिन अब समय मिलते ही अपनों से बात करना या उनके साथ समय बिताना भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम लगता है। कहीं कोई हमसे ज्यादा पॉप्युलर तो नहीं हो गया है, कहीं किसी की पिक्चर को हमारी पिक्चर से ज्यादा कमेंट्स या लाइक्स तो नहीं मिल गए हैं? और अगर ऐसा हो जाता है, तो हम प्रतियोगिता पर उतर आते हैं।
भले ही हमारे निजी रिश्ते कितने ही दूर क्यों न हो रहे हों, उन्हें ठीक करने पर उतना ध्यान नहीं देते हम, जितना डिजिटल वर्ल्ड के रिश्तों को संजोने पर देते हैं.
यह सही है कि इंटरनेट की बदौलत ही हम सोशल साइट्स से जुड़ पाए और उनके जरिए अपने वर्षों पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों से फिर से कनेक्ट हो पाए, लेकिन कहीं न कहीं यह भी सच है कि इन सबके बीच हमारे निजी रिश्तों और फुर्सत के पलों ने सबका खामियाजा भुगता है। शायद ही आपको याद आता हो कि आख़िरी बार आपने अपनी मां के साथ बैठकर चाय पीते हुए सिर्फ इधर-उधर की बातें कब की थीं?
बिना मोबाइल के आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ कब डायनिंग टेबल पर बैठे थे? अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में बिना लैपटॉप के, बिना ईमेल चेक करते हुए कब यूं ही शरारतभरी बातें की थीं?
अपने बच्चे के लिए घोड़ा बनकर उसे हंसाने का जो मजा है, वो शायद अब एक जनरेशन पहले के पैरेंट्स ही जान पाएंगे, क्योंकि आजकल सिर्फ पिता ही नहीं, मम्मी भी इंटरनेट के बोझ तले दबी हैं।

स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है
रिसर्च बताते हैं कि सोशल साइट्स पर बहुत ज्यादा समय बिताना एक तरह का एडिक्शन है। यह एडिक्शन ब्रेन के उस हिस्से को एक्टिवेट करता है, जो कोकीन जैसे नशीले पदार्थ के एडिक्शन पर होता है.

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