
माना जाता है कि स्वतन्त्रता के लिये घसंर्ष गढ़वाल में सन् 1920 के बाद प्रारंभ हुआ , इसकी शुरूआत क्षेत्रीय जन आन्दोलनों के बाद ही मुखर हुई, जानकर बताते है कि गढ़वाल के लोगों का पूरे विश्व में मान बढ़ा। गाँधी जी व नेहरु जी के आगमन से यहाँ के लोगों में चेतना का संचार हुआ, फलस्वरूप कांग्रेस की गतिविधियाँ बढ़ गई और लोग जुड़ते चले गये। पेशावर सैन्य विद्रोह ने ब्रिटिश गढ़वाल को विशेष रूप से प्रभावित किया।
सन 1942 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया था । बता दे कि इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।

शुरुआत में तो इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा।
बड़े ही गर्व कि बात है कि स्वतन्त्रता संग्राम में गढ़वाल वासियों का योगदान देश के किसी भी क्षेत्र से कम नही था, उस वक्त आजाद हिंद फौज में लगभग ढाई हजार सैनिक गढ़वाली थे.



