
देहरादून। एक ओर उत्तराखंड की सड़कों पर अवैध अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है। इसके पीछ उच्च न्यायालय नैनीताल का आदेश बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में दर्जनों सरकारी भवन ऐसे है जो अवैध कब्जे के रूप में ही बने हुए है। इनमें विधानसभा भवन भी शामिल है जो रिस्पना नदी के किनारे बना हुआ है। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 45 बड़े नाले हैं और आधा देहरादून नालों-खालों में ही बसा है। जिस ढंग से अतिक्रमण अभियान पर चुनौतियां आ रही है वह इस बात का संकेत है कि यह अभियान कभी न कभी कानूनी दाव पेंच में फंस सकता है।
आंकड़ों की माने तो राजधानी में लगभग डेढ़ सौ के आसपास अनाधिकृत कालोनियां है जिन्हें पूरी तरह हटाया जाना संभव नहीं है। साथ ही साथ प्रशासन के पास इन बस्तियों के नियमितिकरण के अलावा कोई अन्य चारा नहीं है। केवल दो नदियों पर ही यानि रिस्पना और बिंदाल नदियों पर लगभग 40 हजार कच्चे मकान बने हुए हैं जिनमें लगभग 3 लाख आबादी रही है। यह आबादी कहां जाएगी यह यक्ष प्रश्न है। इसके साथ ही साथ जो सरकारी भवन जलागम क्षेत्र में बने हुए हैं उन्हें सरकार कैसे हटाएगी। इन भवनों में नेहरू कालोनी थाना से लेकर दून विश्वविद्यालय, दूरदर्शन केंद्र, विधानसभा भवन जैसे भवन है जिन्हें हटाया जाना संभव नहीं है। ध्वस्तिकरण की मार केवल गरीबों पर ही पड़ेगी या सरकारी भवन भी इसके शिकार होंगे इस बात की चर्चा लगातार बनी हुई है।



